नई दिल्ली : सनातन परंपरा में एकादशी व्रत को भगवान विष्णु की उपासना के लिए अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून, गुरुवार को रखा जाएगा। मान्यता है कि इस व्रत को पूर्ण विधि-विधान से करने और व्रत कथा सुनने या पढ़ने से वर्षभर की सभी 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इसी कारण इसे विशेष महत्व दिया जाता है। यह व्रत भीमसेन द्वारा किए जाने के कारण भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 24 जून को शाम 6:12 बजे प्रारंभ होकर 25 जून को रात 8:09 बजे तक रहेगी। व्रत का संकल्प 25 जून की सुबह स्नान और पूजा के बाद लिया जाएगा। इस दिन अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है, इसी वजह से इसका नाम निर्जला एकादशी पड़ा। विष्णु पूजा का शुभ समय सुबह 5:25 बजे से 7:10 बजे तक बताया गया है। व्रत का पारण 26 जून को सूर्योदय के बाद सुबह 8:13 बजे तक किया जा सकता है।
निर्जला एकादशी व्रत कथा: जब भीम ने पूछा मोक्ष पाने का उपाय
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास से कहा कि उनकी माता कुंती और उनके अन्य भाई नियमित रूप से व्रत, स्नान, दान और धार्मिक कार्य करते हैं, लेकिन वे स्वयं उपवास नहीं कर पाते। उन्हें चिंता थी कि यदि वे व्रत नहीं करेंगे तो मोक्ष कैसे प्राप्त होगा।
भीम ने बताया कि उन्हें अत्यधिक भूख लगती है और भोजन के बिना रहना उनके लिए संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके शरीर में वृक नाम की अग्नि है, जिसे शांत करने के लिए उन्हें बार-बार भोजन करना पड़ता है।
वेदव्यास ने बताया एक ऐसा व्रत, जो साल में केवल एक बार आता है
भीम की बात सुनकर महर्षि वेदव्यास ने पहले हर माह की दोनों एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। लेकिन जब भीम ने अपनी असमर्थता जताई, तब उन्होंने एक विशेष उपाय बताया।
वेदव्यास ने कहा कि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी ऐसा व्रत है, जिसे वर्ष में एक बार करने से सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है। इस व्रत में सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी तक अन्न और जल का त्याग करना होता है।
मान्यता: इस व्रत से मिलता है 24 एकादशी व्रतों का फल
कथा के अनुसार, महर्षि वेदव्यास ने बताया कि जो व्यक्ति नियमपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत करता है, भगवान विष्णु की पूजा करता है और द्वादशी के दिन दान-पुण्य के बाद पारण करता है, उसे वर्षभर की सभी 24 एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। ऐसी भी धार्मिक मान्यता है कि इससे व्यक्ति पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति करता है।
भीमसेन ने रखा व्रत, मिली श्रीहरि की कृपा
वेदव्यास की बात सुनकर भीम प्रसन्न हुए और उन्होंने निर्जला एकादशी आने पर पूरे नियम और विधि से व्रत किया। भगवान विष्णु की पूजा की और द्वादशी के दिन दान-पुण्य कर व्रत का पारण किया। मान्यता के अनुसार, इससे उन पर श्रीहरि की कृपा हुई और उन्हें पुण्य फल प्राप्त हुआ।