जून 2026 का महीना भारत के मौसम इतिहास में चर्चा का विषय बन गया है। विभिन्न मौसमीय आंकड़ों और रिपोर्टों के अनुसार, इस वर्ष जून में देश के कई हिस्सों में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है। यही वजह है कि कई रिपोर्टों में इसे पिछले 126 वर्षों के सबसे शुष्क जून महीनों में से एक बताया जा रहा है।
मानसून की धीमी शुरुआत और कई राज्यों में वर्षा की कमी ने किसानों, मौसम वैज्ञानिकों और सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि मानसून अभी जारी है, लेकिन जून के शुरुआती तीन सप्ताह में दर्ज हुई बारिश की कमी ने सूखे की आशंकाओं को जन्म दिया है।

किसानों, फसलों और महंगाई पर क्या होगा असर?
कमजोर मानसून और बारिश की कमी का सबसे बड़ा असर देश के कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। भारत की लगभग आधी खेती आज भी मानसून पर निर्भर है, इसलिए यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है तो खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। धान, सोयाबीन, कॉटन, मक्का और दालों जैसी फसलें पर्याप्त बारिश पर निर्भर करती हैं, ऐसे में कम वर्षा किसानों की पैदावार और आय दोनों को प्रभावित कर सकती है।
कई इलाकों में किसान पहले ही बुवाई के लिए पर्याप्त नमी का इंतजार कर रहे हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में बोई गई फसलों पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यदि बारिश की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो सिंचाई की लागत बढ़ सकती है और जलाशयों तथा भूजल स्तर पर भी दबाव बढ़ेगा।इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा।
कृषि उत्पादन घटने की स्थिति में बाजार में अनाज, दालें, सब्जियां और खाद्य तेलों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है। यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक और कृषि विशेषज्ञ आने वाले जुलाई और अगस्त के मानसून पर विशेष नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यही महीने तय करेंगे कि चिंता वास्तविक संकट में बदलती है या नहीं।
किन राज्यों में सबसे ज्यादा चिंता?
बारिश की कमी का असर देश के कई हिस्सों में दिखाई दे रहा है। पूर्वोत्तर से लेकर पश्चिम और मध्य भारत तक कई राज्य सामान्य से कम वर्षा का सामना कर रहे हैं। असम, मेघालय, गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, बिहार और दिल्ली समेत कई क्षेत्रों में जून के दौरान उल्लेखनीय वर्षा घाटा दर्ज किया गया है।
इन राज्यों में कम बारिश ने खेती, जल भंडारण और पेयजल उपलब्धता को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं, जिसके कारण मौसम विशेषज्ञ स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
महाराष्ट्र में स्थिति चिंताजनक
महाराष्ट्र इस वर्ष कमजोर मानसून की मार झेलने वाले राज्यों में सबसे प्रमुख रूप से सामने आया है। जून के दौरान राज्य के कई हिस्सों में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में भी वर्षा का स्तर पिछले 12 वर्षों के सबसे निचले स्तरों में पहुंच गया। लगातार कम बारिश का असर जलाशयों पर भी दिखाई देने लगा है, जहां जलस्तर में गिरावट दर्ज की गई।
स्थिति को देखते हुए कुछ क्षेत्रों में जल संरक्षण और पानी के उपयोग को लेकर एहतियाती कदम उठाने पड़े हैं।
विदर्भ में 70% तक बारिश की कमी
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के कई जिलों में लगभग 70 प्रतिशत तक वर्षा की कमी दर्ज की गई है। इसका सीधा असर खरीफ फसलों की बुवाई पर पड़ सकता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
तेलंगाना में अधिकांश जिले प्रभावित
तेलंगाना के 33 जिलों में से 27 जिलों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती मानसून के दौरान वर्षा की यह कमी पिछले कई एल नीनो वर्षों की तुलना में भी अधिक गंभीर मानी जा रही है।
दिल्ली और बिहार में भी चिंता
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में जून के दौरान लगभग 25 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई। वहीं बिहार में मानसून की देरी और लगातार गर्मी ने सूखे जैसी आशंकाओं को बढ़ाया है। कई क्षेत्रों में किसान समय पर बुवाई नहीं कर पाए हैं।
क्या एल नीनो है वजह?
वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रशांत महासागर में बढ़ती गर्मी और संभावित मजबूत एल नीनो का असर वैश्विक मौसम पर पड़ सकता है। एल नीनो की स्थिति बनने पर भारत में मानसून कमजोर पड़ने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे बारिश में कमी आ सकती है।
हाल ही में NASA के Sentinel-6 सैटेलाइट ने प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह की ऊंचाई और गर्म पानी के विशाल भंडार को रिकॉर्ड किया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह समुद्र के भीतर जमा हो रही असामान्य गर्मी का संकेत है, जो भविष्य में एल नीनो को और मजबूत बना सकती है।
क्या भारत में सूखा पड़ना तय है?
फिलहाल इसका जवाब ‘नहीं’ है।
हालांकि जून के दौरान कई राज्यों में बारिश की कमी दर्ज की गई है, लेकिन मानसून अभी समाप्त नहीं हुआ है। पिछले कुछ दिनों में मानसून ने दोबारा रफ्तार पकड़ी है और महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ तथा ओडिशा समेत कई क्षेत्रों की ओर तेजी से आगे बढ़ा है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि केवल जून के आंकड़ों के आधार पर पूरे देश में बड़े सूखे की घोषणा करना उचित नहीं होगा। जुलाई और अगस्त की वर्षा मानसून के अंतिम प्रदर्शन को तय करेगी।
जून 2026 निश्चित रूप से हाल के वर्षों के सबसे शुष्क जून महीनों में से एक रहा है और देश के कई राज्यों में वर्षा की कमी ने चिंता बढ़ाई है। लेकिन अभी मानसून का बड़ा हिस्सा बाकी है। इसलिए यह कहना कि भारत में बड़ा सूखा पड़ना तय है, फिलहाल जल्दबाजी होगी। आने वाले सप्ताहों में मानसून की प्रगति ही देश की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करेगी।