खाड़ी देशों में अब शांति नजर आ रही है, क्योंकि ईरान और अमेरिका के बीच सीज़फायर हो गया है और दोनों देशों के बीच पीस डील पर हस्ताक्षर भी हो चुके हैं। इसके बाद पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर दोनों देशों के बीच शांति का यह समझौता कैसे हुआ?
इस शांति समझौते को अंजाम तक पहुंचाने में पाकिस्तान की भूमिका को भी सराहा जा रहा है, लेकिन अब एक नई मीडिया रिपोर्ट सामने आई है, जिसने इस डील को लेकर एक अलग ही तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस समझौते को अंतिम रूप देने में संयुक्त अरब अमीरात के कारोबारी शेख तहनून बिन जायद अल नाहयान की सबसे बड़ी भूमिका रही है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, नाहयान के प्रयासों के चलते ही यूएई ने युद्ध के बीच शांति की पहल की, जिसे अंततः अमेरिका को भी स्वीकार करना पड़ा। कहा जा रहा है कि नाहयान की सक्रिय भूमिका के कारण मिडिल ईस्ट में इज़राइल कुछ हद तक अलग-थलग पड़ गया।
मिडिल ईस्ट (खाड़ी देशों) के इतिहास में एक ऐसा भूचाल आया है जिसने वाशिंगटन से लेकर यरुशलम तक के होश उड़ा दिए हैं। ईरान और अमेरिका के बीच हुए ऐतिहासिक सीजफायर के पीछे की जो इनसाइड स्टोरी अब निकलकर सामने आ रही है, उसने पूरी दुनिया की खुफिया एजेंसियों को हैरान कर दिया है। ब्लूमबर्ग, रॉयटर्स और एक्सियोस जैसी मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से दावा किया जा रहा है कि इस नामुमकिन सी दिखने वाली डील को मुमकिन बनाने के पीछे यूएई (UAE) के सबसे शक्तिशाली रणनीतिकार शेख तहनून बिन जायद अल नाहयान का दिमाग था।
जब नाकाम हुई पाकिस्तान-कतर की मध्यस्थता, जेडी वेंस को लौटना पड़ा खाली हाथ
इस महा-डील की शुरुआत बेहद नाटकीय रही। अप्रैल के महीने में जब अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की रूपरेखा तैयार हो रही थी, तब पाकिस्तान और कतर मध्यस्थ की भूमिका में थे। लेकिन उस वक्त यूएई इस बातचीत के पक्ष में नहीं था और उसने ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए युद्ध तक का प्रस्ताव रख दिया था।
शर्तों पर सहमति न बनने के कारण यह कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह फेल हो गया। नतीजा यह हुआ कि अमेरिकी वार्ता दल के प्रमुख जेडी वेंस को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से खाली हाथ वापस वाशिंगटन लौटना पड़ा।
- ‘मास्टरमाइंड’ नाहयान की एंट्री: $3 अरब का दांव और पासा पलट गया जब कूटनीतिक रास्ते बंद हो चुके थे, तब यूएई ने कमान शेख तहनून बिन जायद अल नाहयान को सौंपी। नाहयान ने पारंपरिक रास्तों को छोड़कर सीधे ईरान के सर्वोच्च नेताओं से संपर्क साधा।
- सीक्रेट डील: रॉयटर्स के मुताबिक, यूएई ने ईरान की जब्त की गई 3 अरब डॉलर की भारी-भरकम राशि को रिलीज कर दिया।
- अटैक न करने की गारंटी: इस बड़ी रकम के बदले ईरान ने यूएई को भरोसा दिया कि वह उस पर कभी हमला नहीं करेगा।
- ट्रम्प पर दबाव: ईरान के साथ रिश्ते सुधरते ही यूएई ने पूरे खाड़ी देशों को एक मंच पर ला खड़ा किया। इस नए खाड़ी गठबंधन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर पीस डील के लिए ऐसा चौतरफा दबाव बनाया कि सुपरपावर अमेरिका को झुकना पड़ा।
- डोनाल्ड ट्रम्प का बड़ा बयान: एक्सियोस को दिए एक इंटरव्यू में राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपनी मजबूरी जाहिर करते हुए कहा, “दुनिया के पेट्रोलियम भंडार तेजी से सूख रहे थे, ग्लोबल इकोनॉमी को बचाने के लिए मेरे पास इस डील को स्वीकार करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था।”
अब्राहम एकॉर्ड को झटका, इजरायल पड़ा बिल्कुल अकेला!
इस डील का सबसे घातक असर इजरायल पर पड़ा है। यूएई, जो कभी अब्राहम समझौते (Abraham Accords) के तहत इजरायल का सबसे करीबी अरब दोस्त बनकर उभरा था, उसने इस डील के लिए इजरायल का साथ छोड़ दिया है।
नाराजगी की वजह: सूत्रों के मुताबिक, यूएई इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय से लीक हुई एक खुफिया रिपोर्ट से बेहद खफा था। इस लीक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि ईरान के साथ युद्ध के दौरान बेंजामिन नेतन्याहू ने यूएई का गुप्त दौरा किया था। इस धोखे का जवाब नाहयान ने ईरान से हाथ मिलाकर दिया, जिससे आज इजरायल पूरे मिडिल ईस्ट में अलग-थलग पड़ गया है।
अगले दौर की बैठक: अब इन बड़े मुद्दों पर टिकी है दुनिया की नजर
इस अस्थाई (Temporary) डील के बाद अब अमेरिका और ईरान के बीच पूर्ण शांति समझौते के लिए मुख्य टेबल टॉक्स शुरू होने जा रही हैं, जिसमें मुख्य एजेंडा निम्नलिखित होगा:
अमेरिका की मांगें
यूरेनियम शिफ्टिंग: अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) के पूरे स्टॉक को किसी तीसरे देश में शिफ्ट करे।
सेंट्रीफ्यूज की तबाही: ईरान में परमाणु हथियार बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले सभी सेंट्रीफ्यूज को पूरी तरह नष्ट किया जाए।
ईरान की शर्तें
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर टोल: ईरान इस रणनीतिक समुद्री रास्ते से गुजरने वाले जहाजों पर आधिकारिक रूप से टैक्स (टोल) वसूलना चाहता है। ईरान की शर्त है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके इस अधिकार को मंजूरी दे।
अब देखना यह है कि शेख तहनून की बनाई इस जमीन पर अमेरिका और ईरान कितनी दूर तक साथ चल पाते हैं।