नई दिल्ली: अमेरिकी बाजार में स्पेसएक्स के आईपीओ को लेकर निवेशकों के बीच जबरदस्त उत्साह देखने को मिला, लेकिन इसके साथ ही एक नया विवाद भी खड़ा हो गया। विवाद की वजह बनी अमेरिकी ब्रोकरेज फर्म फिडेलिटी की वह शर्त, जिसमें रिटेल निवेशकों के लिए शेयर बेचने पर प्रतिबंध जैसी व्यवस्था रखी गई। इस नियम को लेकर भारतीय बाजार विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं और भारतीय नियामकीय व्यवस्था से इसकी तुलना की है।
क्या है पूरा मामला?
रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेसएक्स आईपीओ में भागीदारी आसान बनाने के लिए फिडेलिटी ने न्यूनतम निवेश सीमा घटाकर 2 हजार डॉलर कर दी। हालांकि इसके साथ एक अतिरिक्त शर्त जोड़ी गई। नियम के अनुसार, यदि किसी निवेशक ने शेयर मिलने के 15 दिनों के भीतर उन्हें बेच दिया तो उसे अगले 90 दिनों तक ट्रेडिंग से बाहर रखा जा सकता है।
इसी शर्त को लेकर बाजार में बहस तेज हो गई और इसे रिटेल निवेशकों की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाने लगा।
भारतीय विशेषज्ञों ने क्यों उठाए सवाल?
इस मामले पर भारतीय बाजार विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में इस तरह के नियम लागू करना संभव नहीं माना जाता। यहां निवेश से जुड़े नियम और बाजार संचालन का अधिकार नियामक संस्था के पास होता है, किसी ब्रोकरेज कंपनी के पास नहीं।
इसी संदर्भ में बाजार जगत से जुड़े कई प्रमुख नामों ने टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय व्यवस्था में निवेशकों के अधिकारों को लेकर स्पष्ट नियम मौजूद हैं और किसी ब्रोकर को ऐसे प्रतिबंध लगाने की अनुमति नहीं होती।
भारत में आईपीओ निवेशकों के लिए क्या व्यवस्था है?
भारतीय शेयर बाजार में आम रिटेल निवेशक के लिए सूचीबद्ध होने के बाद शेयर बेचने पर आम तौर पर कोई लॉक-इन अवधि लागू नहीं होती। निवेशक सूचीबद्धता के बाद नियमानुसार खरीद-बिक्री कर सकते हैं।
हालांकि कुछ श्रेणियों जैसे प्रमोटर, बड़े संस्थागत निवेशक और एंकर निवेशकों के लिए अलग-अलग लॉक-इन प्रावधान लागू होते हैं, जिनका उद्देश्य बाजार में स्थिरता बनाए रखना माना जाता है।
भारत में किन पर लागू होता है लॉक-इन नियम?
- प्रमोटरों की न्यूनतम हिस्सेदारी तय अवधि तक बनी रहती है
- बड़े निवेशकों और कुछ संस्थागत श्रेणियों पर निर्धारित लॉक-इन लागू हो सकता है
- एंकर निवेशकों के लिए चरणबद्ध लॉक-इन व्यवस्था लागू रहती है
बाजार में क्यों बढ़ी चर्चा?
विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों को आकर्षित करने और बाजार अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है। इसी वजह से फिडेलिटी के नियमों पर चर्चा तेज हुई और इसे निवेशक अधिकारों तथा बाजार नियंत्रण के नजरिए से देखा जाने लगा।