5 जून बीत गया, पर पर्यावरण बचाने का संदेश नहीं… किमाड़ी-डाकरा उत्तराखंड में पेड़ों के लिए फिर से उठी आवाज, 5 जून को पूरी दुनिया ने विश्व पर्यावरण दिवस मनाया। सोशल मीडिया पर पर्यावरण बचाने के संदेश दिए गए, पौधारोपण कार्यक्रम हुए और लोगों ने प्रकृति के महत्व को याद किया। लेकिन विश्व पर्यावरण दिवस के अगले ही दिन देहरादून के किमाड़ी-डाकरा क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण को लेकर लोगों की चिंता एक बार फिर सड़कों पर दिखाई दी।
किमाड़ी-डाकरा रोड चौड़ीकरण परियोजना के तहत करीबन 700 पेड़ो की कटाई की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि सड़क विकास जरूरी है, लेकिन इसके लिए वर्षों पुराने पेड़ों की बलि देना सही नहीं होगा। इसी मुद्दे को लेकर “पर्यावरण बचाओ आंदोलन 3.0” के तहत लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया और प्रशासन से पेड़ों को बचाने की मांग की।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। उनका मानना है कि सड़क निर्माण के लिए ऐसे विकल्प तलाशे जाने चाहिए, जिससे कम से कम पेड़ों को नुकसान पहुंचे।
6 जून तक इस मामले को लेकर लोगों का विरोध जारी है। सोशल मीडिया पर भी इस अभियान को समर्थन मिल रहा है। स्थानीय नागरिक लगातार प्रशासन और संबंधित विभागों से परियोजना पर पुनर्विचार करने की मांग कर रहे हैं। फिलहाल परियोजना को पूरी तरह रोकने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन लोगों की आवाज लगातार मजबूत होती नजर आ रही है।

विश्व पर्यावरण दिवस हर साल हमें प्रकृति की अहमियत याद दिलाता है। लेकिन असली चुनौती सिर्फ एक दिन पौधा लगाने या संदेश साझा करने की नहीं, बल्कि साल के 365 दिन पर्यावरण की रक्षा करने की है। किमाड़ी-डाकरा का यह मामला भी यही सवाल खड़ा करता है कि क्या विकास की रफ्तार में हम अपने पेड़ों और हरियाली को खोते जा रहे है, प्रशासन विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने के लिए क्या कदम उठाता है। फिलहाल इतना जरूर है कि विश्व पर्यावरण दिवस तो बीत गया, लेकिन पर्यावरण बचाने की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।