वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर बड़ा दावा सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों देशों के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) तैयार हो चुका है और 19 जून को जिनेवा में इस पर औपचारिक मुहर लगने की बात कही जा रही है। हालांकि अभी तक इस समझौते की शर्तें आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं हुई हैं, लेकिन एक मीडिया रिपोर्ट में इसकी 14 प्रमुख शर्तों का दावा किया गया है। यदि यह जानकारी सही साबित होती है तो इसे हाल के वर्षों में ईरान की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धियों में गिना जा सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, जिस ईरान पर लंबे समय से कड़े आर्थिक और रणनीतिक प्रतिबंध लागू थे और जिसकी अरबों डॉलर की संपत्तियां सीमित या फ्रीज थीं, उसे इस समझौते के जरिए व्यापक राहत मिलने की संभावना जताई गई है। दावा किया गया है कि अमेरिका प्रतिबंधों में ढील की दिशा में कदम बढ़ा सकता है और ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर तक की आर्थिक व्यवस्था को समर्थन मिल सकता है। बदले में ईरान को अपने पुराने रुख को दोहराना होगा कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा।
रिपोर्ट में बताए गए समझौते के प्रमुख बिंदु
दावे के मुताबिक, समझौते पर हस्ताक्षर होते ही अमेरिका, ईरान और युद्ध में शामिल सहयोगी देश सभी मोर्चों पर तत्काल और स्थायी रूप से युद्ध समाप्त घोषित करेंगे। इसमें लेबनान का भी जिक्र शामिल बताया गया है। साथ ही दोनों देश भविष्य में एक-दूसरे के खिलाफ धमकी या सैन्य ताकत के इस्तेमाल से बचने का वादा करेंगे।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दोनों देश एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करेंगे और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। अंतिम समझौते को अधिकतम 60 दिनों के भीतर अंतिम रूप देने का लक्ष्य रखा गया है, जिसे आपसी सहमति से आगे बढ़ाया भी जा सकता है।
समुद्री नाकाबंदी खत्म करने और सैनिक हटाने का दावा
रिपोर्ट के अनुसार, MoU लागू होते ही अमेरिका ईरान पर लागू समुद्री प्रतिबंधों और अवरोधों को हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगा। अधिकतम 30 दिनों के भीतर समुद्री व्यापार और जहाजों की आवाजाही को युद्ध से पहले की स्थिति तक बहाल करने का लक्ष्य तय किया गया है।
इसी अवधि में अमेरिका के आसपास के क्षेत्रों से अपनी सैन्य मौजूदगी कम करने या सैनिक हटाने की भी बात कही गई है। दूसरी ओर ईरान को फारस की खाड़ी और ओमान सागर क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करनी होगी और समुद्री माइंस हटाने जैसे कदम उठाने होंगे।
300 अरब डॉलर पुनर्निर्माण योजना और प्रतिबंधों में राहत का दावा
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका और उसके क्षेत्रीय साझेदार ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए एक व्यापक योजना तैयार करेंगे। इसके लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की संभावित व्यवस्था का दावा किया गया है। इस योजना के संचालन का ढांचा अंतिम समझौते के तहत तय होना बताया गया है।
इसके अलावा कहा गया है कि अमेरिका चरणबद्ध तरीके से ईरान पर लागू विभिन्न प्रतिबंधों को हटाने के लिए प्रतिबद्ध हो सकता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़े प्रतिबंधों और अमेरिकी स्तर के आर्थिक प्रतिबंधों का भी उल्लेख किया गया है।
परमाणु कार्यक्रम पर क्या कहा गया?
रिपोर्ट में दावा है कि ईरान दोबारा यह दोहराएगा कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। वहीं संवर्धित यूरेनियम और अन्य परमाणु मुद्दों पर अंतिम समझौते के दौरान समाधान निकाला जाएगा।
जब तक अंतिम समझौता नहीं हो जाता, तब तक दोनों पक्ष मौजूदा स्थिति बनाए रखने पर सहमत रहेंगे। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम में बड़ा बदलाव नहीं करेगा और अमेरिका नए प्रतिबंध लगाने या क्षेत्र में सैन्य विस्तार से बचेगा।
तेल निर्यात और फ्रीज संपत्तियों पर भी चर्चा
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका अपने वित्तीय तंत्र के जरिए ईरानी कच्चे तेल, पेट्रोकेमिकल उत्पादों और संबंधित सेवाओं के निर्यात के लिए छूट देने पर विचार कर सकता है। इसमें बैंकिंग, बीमा और परिवहन सेवाओं से जुड़ी व्यवस्था भी शामिल बताई गई है।
इसके साथ ही दावा किया गया है कि बातचीत आगे बढ़ने की स्थिति में ईरान की फ्रीज या सीमित की गई संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध कराया जा सकता है और इसके लिए जरूरी लाइसेंस और मंजूरी जारी की जाएगी।
ट्रंप ने दावे को बताया गलत, जेडी वेंस ने दी सफाई
300 अरब डॉलर तक की संभावित आर्थिक सहायता और राहत की खबरों के बाद अमेरिका में राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज हो गई। इस बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसे दावों को गलत बताया।
वहीं उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एक इंटरव्यू में कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका सीधे ईरान को पैसा दे रहा है। उनके मुताबिक यदि भविष्य में अन्य देश ईरान में निवेश करना चाहें और ईरान अपना व्यवहार बदले, तभी ऐसी संभावनाएं बन सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका का उद्देश्य सीधे फंड देना नहीं बल्कि परिस्थितियां बनने पर दूसरे देशों को निवेश की अनुमति देना हो सकता है।