विजयादशमी का नाम आते ही मन में रावण के विशाल पुतले और उसकी आग की लपटों का दृश्य कौंध जाता है! देश के कोने-कोने में इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पूरे भारत में रावण की एक जैसी तस्वीर नहीं है? जिस वक्त आधा देश रावण के अंत की खुशियां मना रहा होता है, ठीक उसी वक्त कुछ जगहों पर उसकी पूजा की जा रही होती है, तो कहीं उसकी मृत्यु पर मातम और शोक मनाया जाता है। आखिर कौन था वह ‘ब्रह्मराक्षस‘, जिसे कोई सबसे बड़ा खलनायक मानता है, तो कोई परम शिव-भक्त और अपना पूर्वज? आइए, इस विजयादशमी रावण से जुड़ी भारत की इन अनोखी और रहस्यमयी परंपराओं की पड़ताल करते हैं।
वेदों का ज्ञाता, परम शिव-भक्त और उसकी अनोखी कथाएं
धार्मिक परंपराओं और लोककथाओं में रावण को ‘ब्रह्मराक्षस’ कहा गया है, जहां ‘ब्रह्म’ शब्द का संबंध उसके विद्वान व ब्राह्मण होने से और ‘राक्षस’ का संबंध उसकी माता के कुल से जोड़ा जाता है। रावण के पिता ऋषि विश्रवा थे और माता कैकसी राक्षस कुल से थीं। रावण वेदों और शास्त्रों का महान ज्ञाता था, जिसे संगीत, ज्योतिष और आयुर्वेद की भी गहरी समझ थी। वह भगवान शिव का परम भक्त था।
लोककथाओं में उसे वीणा बजाने वाला कलाकार और दस सिरों वाला बताया गया है। ये दस सिर उसकी असाधारण शक्ति, ज्ञान और काम, क्रोध, लोभ व अहंकार जैसे मानवीय भावों के प्रतीक माने जाते हैं। हालांकि, उसके महान ज्ञान और शक्ति के साथ जुड़ा उसका अहंकार तथा सीता का हरण ही उसके चरित्र का निर्णायक पक्ष बना, जिसके कारण उसे अधर्म के मार्ग पर चलने वाला राजा कहा गया।
कानपुर का यह मंदिर जो साल में खुलता है सिर्फ एक दिन
उत्तर प्रदेश के कानपुर में रावण का एक बेहद प्रसिद्ध और अनोखा मंदिर स्थित है। इस मंदिर की सबसे लोकप्रिय मान्यता यह है कि यह पूरे साल बंद रहता है और सिर्फ विजयादशमी के दिन ही इसके कपाट खोले जाते हैं। इस खास अवसर पर श्रद्धालु रावण की पूजा-अर्चना करते हैं।
यहां रावण को सिर्फ श्रीराम के शत्रु के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रकांड विद्वान और परम शिव-भक्त के रूप में याद किया जाता है। कानपुर का यह मंदिर यह दर्शाता है कि एक ओर जहां पुतला दहन की परंपरा है, वहीं दूसरी ओर उसकी विद्वता का सम्मान करने की परंपरा भी इस देश में मौजूद है।
विजयादशमी पर दहन नहीं, इन जगहों पर मनाया जाता है शोक
भारत के कुछ क्षेत्रों और समुदायों में रावण की मृत्यु पर उत्सव मनाने के बजाय शोक व्यक्त करने की परंपरा है, जहां उसे पूर्वज, राजा या सम्मानित पात्र माना जाता है:
- बिसरख (उत्तर प्रदेश): ग्रेटर नोएडा स्थित इस गांव में कुछ लोग रावण को अपना पूर्वज मानते हैं, इसलिए वे दशहरे पर शोक और प्रार्थना करते हैं.
- जोधपुर (राजस्थान): रावण से अपना वंश जोड़ने वाले कुछ ब्राह्मण परिवारों द्वारा दशहरे के दिन शोक मनाने और श्राद्ध करने की परंपरा देखी जाती है।
- मंदसौर (मध्य प्रदेश): यहां के कुछ स्थानीय समुदाय रावण को मंदोदरी का पति और अपना दामाद मानकर उसका सम्मान करते हैं और उसकी पूजा करते हैं।
विजयादशमी पर रावण दहन का संदेश यह है कि अहंकार, क्रोध और अन्याय का अंत निश्चित है। वहीं, रावण से जुड़ी ये विविध परंपराएं यह साबित करती हैं कि भारतीय संस्कृति में आस्था और लोककथाओं के कई दृष्टिकोण मौजूद हैं, जो रामायण की गाथा को पीढ़ियों से जीवित रखे हुए हैं।