आज यानी 2 अक्टूबर को भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में एक ऐसा काला और खौफनाक अध्याय जुड़ गया है, जिसने पिछले 25 सालों के तमाम रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। निवेशक जिस बात से सबसे ज्यादा डरते थे, आखिरकार वही हुआ—बाजार लगातार 8 हफ्तों से लाल निशान में बंद हो रहा है। मंदी का यह दौर 2020 के कोविड-19 क्रैश और यहाँ तक कि 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के उस खौफनाक दौर से भी लंबा साबित हो रहा है, जिसने निवेशकों की नींद उड़ा दी है। सेंसेक्स और निफ्टी की इस ऐतिहासिक धड़ाम से निवेशकों की गाढ़ी कमाई के ₹26 लाख करोड़ हवा में उड़ चुके हैं।
कितना अंक लुड़का निफ्टी और सेंसेक्स?
इस हफ्ते बाजार में बिकवाली का ऐसा सैलाब आया कि अच्छे-अच्छे दिग्गजों के पोर्टफोलियो हिल गए:
सेंसेक्स का हाल: 1 अक्टूबर 2026 तक सेंसेक्स 570 अंक की भारी गिरावट के साथ 71,909 के स्तर पर बंद हुआ।
निफ्टी की चाल: निफ्टी 50 में 198 अंकों की जोरदार कमजोरी दर्ज की गई और यह लुढ़ककर 22,421 पर आ गया।
इससे पहले सोमवार को ही बाजार में 1,100 से ज्यादा अंकों की बड़ी गिरावट ने निवेशकों के होश उड़ा दिए थे। इस लगातार बिकवाली के दबाव के बीच निफ्टी अहम मनोवैज्ञानिक स्तर यानी 22,500 के नीचे फिसल चुका है। सिर्फ बड़े शेयर ही नहीं, बल्कि मिडकैप (Midcap) और स्मॉलकैप (Smallcap) शेयरों में भी जबरदस्त खून-खराबा देखने को मिला है।
मार्केट कैप को हुआ भारी नुकसान
शेयर बाजार की इस मची उठापटक का सीधा असर कंपनियों की कुल वैल्यू यानी मार्केट कैप पर पड़ा है।
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप 26 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा घट गया है।
इस भीषण गिरावट के बाद देश की तमाम लिस्टेड कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण सिमटकर 467 लाख करोड़ रुपये से नीचे आ गया है।
लगातार बिकवाली और बाजार में छाई मायूसी के बीच निवेशकों की चिंताएं अब चरम पर पहुँच चुकी हैं।
आखिर क्यों धड़ाम हुआ बाजार?
मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारतीय बाजार में जारी इस लंबी गिरावट के पीछे तीन सबसे बड़े और खतरनाक कारण जिम्मेदार हैं:
1. विदेशी निवेशकों (FIIs) की ताबड़तोड़ बिकवाली: विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजारों से लगातार भारी मात्रा में अपना पैसा निकाला है, जिससे शेयरल पर जबरदस्त दबाव बन गया है।
2. कच्चे तेल (Crude Oil) की आग: अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत उछलकर 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुँच गई है। इससे भारत के आयात बिल, फिस्कल डिफिसिट और देश में महंगाई बढ़ने का खतरा मंडराने लगा है।
3. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल: अमेरिका में 10 साल की ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड 5.3% के पार पहुँच चुकी है, जिसके चलते ग्लोबल इन्वेस्टर्स भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी बॉन्ड में निवेश कर रहे हैं।
भारतीय शेयर बाजार में लगातार गिरावट ने निवेशकों के सामने अनिश्चितता बढ़ा दी है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल बाजार पर दबाव बना रहे हैं। हालांकि, आने वाले दिनों में बाजार की दिशा वैश्विक संकेतों, निवेशकों की खरीद-बिक्री और आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। ऐसे में निवेशकों के लिए बाजार की चाल को समझना और जल्दबाजी में फैसले लेने से बचना अहम है।