रियाद: बढ़ती गर्मी और बिजली की बढ़ती खपत के बीच एक ऐसी तकनीक चर्चा में है, जो भविष्य में एयर कंडीशनिंग की तस्वीर बदल सकती है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी प्रणाली विकसित की है, जिसके जरिए बिना बिजली के भी कमरे को ठंडा किया जा सकता है। इस तकनीक का नाम NESCOD (नो इलेक्ट्रिसिटी एंड सस्टेनेबल कूलिंग ऑन डिमांड) है। दावा किया जा रहा है कि इसमें नमक, पानी और सूर्य की ऊर्जा की मदद से कूलिंग की जा सकती है।
यह तकनीक ऐसे समय में सामने आई है जब दुनिया भर में एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेशन सिस्टम बिजली की खपत का बड़ा कारण बन रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह प्रणाली बड़े स्तर पर सफल होती है, तो ऊर्जा बचत के क्षेत्र में बड़ा बदलाव संभव है।
सऊदी अरब के वैज्ञानिकों ने विकसित की तकनीक
इस तकनीक को सऊदी अरब के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। शोधकर्ताओं ने ऐसी प्रक्रिया तैयार की है, जिसमें अमोनियम नाइट्रेट नामक नमक और पानी के बीच होने वाली रासायनिक क्रिया का उपयोग कर वातावरण का तापमान कम किया जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार यह तकनीक केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यावहारिक उपयोग की संभावनाओं पर भी काम किया जा रहा है। इस शोध को वर्ष 2022 में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल एनर्जी एंड एनवायरनमेंटल साइंस में प्रकाशित किया गया था।
कैसे काम करती है यह कूलिंग प्रणाली?
इस तकनीक का आधार एंडोथर्मिक रिएक्शन है। जब अमोनियम नाइट्रेट को पानी में मिलाया जाता है, तो यह आसपास के वातावरण से तेजी से गर्मी अवशोषित करता है। परिणामस्वरूप आसपास का तापमान तेजी से गिरने लगता है।
प्रयोग के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि 25 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले वातावरण में नमक और पानी के मिश्रण से तापमान करीब 20 मिनट के भीतर घटकर 3.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। यह दर्शाता है कि यह प्रक्रिया प्रभावी रूप से ठंडक पैदा कर सकती है।
धूप से दोबारा तैयार हो जाता है नमक
तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसका पुनर्चक्रण तंत्र है। जब अमोनियम नाइट्रेट पानी में घुल जाता है, तो एक घोल तैयार होता है। इस घोल को सूर्य की तेज गर्मी और रोशनी में रखा जाता है, जिससे पानी वाष्पित हो जाता है और नमक दोबारा क्रिस्टल के रूप में प्राप्त हो जाता है।
इसके बाद उसी नमक का फिर से उपयोग किया जा सकता है। इस तरह नमक, पानी और धूप के जरिए लगातार कूलिंग चक्र संचालित किया जा सकता है।
पूरी इमारत को ठंडा करने की क्षमता
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तकनीक को भवनों में बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है। इसके लिए छत पर सोलर रीजनरेशन यूनिट और कमरों के भीतर कूलिंग यूनिट स्थापित की जा सकती हैं।
कूलिंग यूनिट में तैयार ठंडे घोल के ऊपर से हवा प्रवाहित की जाती है, जिससे हवा का तापमान कम हो जाता है और कमरे में ठंडक फैलती है। यह प्रक्रिया पारंपरिक एसी की तरह ही कूलिंग प्रदान कर सकती है, लेकिन इसके लिए बिजली, कंप्रेसर या रेफ्रिजरेंट गैस की आवश्यकता नहीं पड़ती।
रात में भी संभव है कूलिंग
दिन के समय सूर्य की सहायता से नमक का पुनर्निर्माण होता रहता है। वहीं रात में पहले से संग्रहित नमक का उपयोग कर कूलिंग जारी रखी जा सकती है। इसके लिए पर्याप्त मात्रा में नमक का भंडारण आवश्यक होगा, जिससे रातभर सिस्टम काम करता रहे।
कोल्ड स्टोरेज और रेफ्रिजरेशन में भी हो सकता है उपयोग
विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक केवल एयर कंडीशनिंग तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग कोल्ड स्टोरेज, खाद्य पदार्थों के संरक्षण, कृषि उत्पादों को सुरक्षित रखने, पेयजल को ठंडा रखने और दूरदराज के क्षेत्रों में रेफ्रिजरेशन सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए भी किया जा सकता है।
खास बात यह है कि ऐसे क्षेत्रों में भी इसका उपयोग संभव है जहां बिजली की पहुंच सीमित या नहीं के बराबर है।
बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पहले चुनौती बाकी
हालांकि प्रयोगशाला स्तर पर इस तकनीक के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर व्यावहारिक रूप देने की प्रक्रिया अभी जारी है। वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसे किफायती, टिकाऊ और व्यावसायिक रूप से उपयोगी बनाना है।
यदि यह तकनीक वास्तविक परिस्थितियों में सफल साबित होती है, तो भविष्य में एयर कंडीशनिंग और कूलिंग सिस्टम के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।