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‘तानाशाही मुर्दाबाद’ के नारे क्यों? रियाल की गिरावट और सत्ता का संकट! क्या ईरान एक बड़े विद्रोह की ओर है ?

ईरान में लोग एक बार फिर सड़कों पर है। तेहरान से लेकर मशहद, इस्फहान, शिराज़, यज़्द और कराज तक दुकानें बंद हैं, छात्र सड़कों पर उतर चुके हैं और नारों में अब सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के खिलाफ गुस्सा झलक रहा है। पिछले दो दिनों से ईरान के कई शहरों और कस्बों में अराजकता का माहौल बना हुआ है। सोशल मीडिया पर सामने आ रहे वीडियो में लोग एक सुर में “मुल्ला ईरान छोड़ो” और “तानाशाही मुर्दाबाद” के नारे लगाते दिख रहे हैं। माना जा रहा है कि यह उन लोगों की आवाज़ है जो अब इस्लामिक रिपब्लिक को नहीं चाहते।

ईरान की आर्थिक हालत इस गुस्से की सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। ईरानी रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच चुका है। महंगाई 40 से 50 प्रतिशत के बीच है। खाने-पीने की चीज़ें, दवाइयां और रोज़मर्रा की जरूरतें आम लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिसंबर 2025 में रियाल गिरकर लगभग 1.4 मिलियन प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया। इस गिरावट ने आयात को बेहद महंगा बना दिया और छोटे व्यापारियों को सड़क पर उतरने पर मजबूर कर दिया। तेहरान के ग्रैंड बाज़ार से शुरू हुआ विरोध इसी आर्थिक हताशा का नतीजा था। हालात बिगड़ने पर सेंट्रल बैंक प्रमुख मोहम्मद रज़ा फ़र्ज़िन को इस्तीफा देना पड़ा, जिसे सरकार की नाकामी के संकेत के तौर पर देखा गया।

लेकिन यह आंदोलन सिर्फ महंगाई तक सीमित नहीं है। यह 1979 की क्रांति के बाद बनी थियोकरेटिक व्यवस्था से उपजी राजनीतिक थकान भी है। प्रदर्शन के दौरान “तानाशाही मुर्दाबाद” के साथ-साथ “लॉन्ग लिव द शाह” जैसे नारे भी सुनाई दिए। कुछ प्रदर्शनकारियों को शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के बेटे के समर्थन में नारे लगाते हुए भी सुना गया। विश्वविद्यालयों के छात्र भी इस आंदोलन में शामिल हो चुके हैं और सीधे तौर पर सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई को निशाना बना रहे हैं।

ईरान की मौजूदा स्थिति को अमेरिकी प्रतिबंधों से अलग नहीं देखा जा सकता। 2018 में डोनाल्ड ट्रंप के JCPOA से बाहर आने और “मैक्सिमम प्रेशर पॉलिसी” के बाद से तेल निर्यात, बैंकिंग और डॉलर लेन-देन पर भारी असर पड़ा। 2025 में ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद दबाव और बढ़ा, जिससे विदेशी निवेश ठप हो गया और रियाल फ्री-फॉल में चला गया।

इस बीच गाज़ा युद्ध और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने ईरान की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। सैन्य दबाव, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और घरेलू गुस्सा, तीनों ने मिलकर ईरान को संकट के चौराहे पर खड़ा कर दिया है। राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से बातचीत के निर्देश तो दिए हैं, लेकिन सवाल यही है कि क्या जनता अब सिर्फ बयानों से मानेगी? विश्लेषकों के मुताबिक, अगर हालात नहीं सुधरे, तो यह आर्थिक आंदोलन जल्द ही एक बड़े राजनीतिक संकट में बदल सकता है।

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