जमशेदपुर: झारखंड के घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच एक ऐसा मंदिर मौजूद है, जिसकी परंपराएं इसे बाकी मंदिरों से अलग पहचान देती हैं। जमशेदपुर के पास दलमा की पहाड़ियों में स्थित हाथी खेदा ठाकुर मंदिर में किसी देवी-देवता की पारंपरिक मूर्ति की पूजा नहीं होती। यहां मिट्टी से बने हाथियों को पूजा जाता है। करीब 300 साल से चली आ रही इस परंपरा के तहत श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर मिट्टी का हाथी चढ़ाते हैं। मंदिर से जुड़े कुछ ऐसे नियम भी हैं, जिन्हें आज तक स्थानीय लोग श्रद्धा के साथ मानते आ रहे हैं।
स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, सैकड़ों साल पहले दलमा के जंगलों में जंगली हाथियों का आतंक काफी ज्यादा था। हाथियों के झुंड रात के समय गांवों में घुस जाते थे और खेतों में खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाते थे।
हाथियों से बचाव के लिए ग्रामीण रात में ढोल बजाकर और मशालें जलाकर पहरा देते थे। इसके बावजूद समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई। बताया जाता है कि गांव के बुजुर्गों की सलाह पर लोगों ने मिट्टी के हाथी बनाकर उनकी पूजा शुरू की।
स्थानीय मान्यता के मुताबिक, इसके बाद हाथियों के हमले कम होने लगे। इसी परंपरा के साथ मंदिर की आस्था भी जुड़ती चली गई। स्थानीय भाषा में ‘खेदा’ का अर्थ भगाना या दूर रखना बताया जाता है। इसी वजह से इसे हाथी खेदा ठाकुर मंदिर कहा जाता है।
हाथी खेदा मंदिर की सबसे खास बात यही है कि यहां पारंपरिक तौर पर संगमरमर, धातु या किसी अन्य सामग्री से बनी देवी-देवता की मूर्ति नहीं है। मंदिर परिसर और उसके आसपास अलग-अलग आकार के मिट्टी के हाथी नजर आते हैं।
श्रद्धालु अपनी मन्नत लेकर यहां पहुंचते हैं और मन्नत पूरी होने के बाद मिट्टी का हाथी चढ़ाते हैं। इसके साथ नारियल, धूप, दीप और चुनरी चढ़ाने की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है।
मंदिर से कई पुराने स्थानीय रीति-रिवाज भी जुड़े हुए हैं। यहां कुछ श्रद्धालु मन्नत पूरी होने के बाद बकरे या भेड़ की बलि भी चढ़ाते हैं।
स्थानीय और आदिवासी परंपराओं में इसे महत्वपूर्ण माना जाता है। मंदिर से जुड़ी इन मान्यताओं और रीति-रिवाजों को स्थानीय लोग लंबे समय से श्रद्धा के साथ निभाते आ रहे हैं।
हाथी खेदा मंदिर की परंपराओं में प्रसाद को लेकर भी एक खास नियम बताया जाता है। यहां चढ़ाया गया प्रसाद महिलाओं को नहीं दिया जाता।
इसके अलावा मंदिर में मिलने वाला प्रसाद परिसर में ही ग्रहण करना होता है। इसे घर ले जाने की अनुमति नहीं है। दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु मंदिर से जुड़े इन नियमों का पालन करते हैं।
मकर संक्रांति, चैत्र महीने और स्थानीय आदिवासी त्योहारों के दौरान हाथी खेदा मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंगलवार और रविवार को भी यहां काफी भीड़ रहती है।
दलमा के जंगलों में आज भी जंगली हाथियों की मौजूदगी रहती है। ऐसे में यह मंदिर केवल स्थानीय आस्था और परंपरा का केंद्र नहीं है, बल्कि जंगल और उसके आसपास रहने वाले लोगों के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंध की एक अलग तस्वीर भी पेश करता है।
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