नई दिल्ली: आज के दौर में 40 की उम्र को कई बार ‘न्यू 60’ कहा जाने लगा है। वजह यह है कि जिन बीमारियों का खतरा पहले आमतौर पर ज्यादा उम्र में बढ़ता था, वे अब 30-40 साल की उम्र में ही लोगों को अपनी चपेट में लेने लगी हैं। इंसुलिन प्रतिरोध, टाइप-2 डायबिटीज, फैटी लिवर, मोटापा और दिल की बीमारियां कम उम्र में तेजी से बढ़ रही हैं। शारदा हॉस्पिटल के इंटरनल मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. भुमेश त्यागी के मुताबिक, सिर्फ शरीर का वजन ही नहीं, बल्कि शरीर के भीतर चल रही मेटाबॉलिक प्रक्रियाएं भी इन समस्याओं के लिए अहम जिम्मेदार हैं।
डॉक्टर के मुताबिक, भारत में डायबिटीज, इंसुलिन प्रतिरोध, फैटी लिवर, मोटापा और हृदय संबंधी बीमारियां पश्चिमी देशों की तुलना में कम उम्र में देखने को मिल रही हैं। खास बात यह है कि इन समस्याओं का खतरा सिर्फ अधिक वजन वाले लोगों तक सीमित नहीं है।
कई लोग बाहर से दुबले-पतले दिखाई देते हैं और उनका बीएमआई भी सामान्य हो सकता है, लेकिन इसके बावजूद उनके शरीर में मेटाबॉलिक गड़बड़ी मौजूद हो सकती है। इसलिए सिर्फ वजन या बीएमआई देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि शरीर अंदर से पूरी तरह स्वस्थ है।
भारत में डायबिटीज के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इंसुलिन प्रतिरोध आगे चलकर प्रीडायबिटीज और फिर टाइप-2 डायबिटीज का रूप ले सकता है। अब 30 और 40 साल की उम्र के लोगों में भी यह समस्या देखने को मिल रही है।
खास बात यह है कि सामान्य वजन वाले लोग भी इससे अछूते नहीं हैं। शरीर में जमा अंदरूनी फैट और बढ़ा हुआ ब्लड शुगर स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्या बन सकता है।
फैटी लिवर को भी अब उम्र बढ़ने के साथ होने वाली बीमारी मानकर चलना सही नहीं है। दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले और दफ्तरों में काम करने वाले लोगों में यह समस्या देखने को मिल रही है।
खराब खानपान और बदलती जीवनशैली के कारण बाहर से पतले दिखने वाले व्यक्ति के लिवर में भी धीरे-धीरे फैट जमा हो सकता है। पहले जहां यह समस्या ज्यादा उम्र में दिखाई देती थी, वहीं अब 20-30 साल के युवाओं में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं।
कम उम्र में बढ़ता कोलेस्ट्रॉल भी चिंता का विषय है। 30-40 साल की उम्र में हृदय संबंधी समस्याएं सामने आने लगी हैं। हार्ट अटैक, शरीर में लंबे समय तक रहने वाली सूजन और हाई एलपी(ए) जैसे कारक धमनियों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इन वजहों से कम उम्र में ही दिल की गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में युवाओं के लिए अपनी जीवनशैली और स्वास्थ्य की नियमित निगरानी करना जरूरी हो जाता है।
मेटाबॉलिक गड़बड़ियों का असर हार्मोनल स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। युवाओं में पीसीओएस, टेस्टोस्टेरोन के स्तर में गिरावट और थायरॉइड से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं, जिनका संबंध इंसुलिन प्रतिरोध से भी बताया जाता है।
वहीं, मौजूदा जीवनशैली के कारण युवाओं में हाई ब्लड प्रेशर की समस्या भी बढ़ रही है। इसके साथ ही मेटाबॉलिक बीमारियों का खतरा भी तेजी से सामने आ रहा है।
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