धर्म

गोगा नवमी पर क्यों होती है नाग देवता और गोगाजी की पूजा? संतान की लंबी उम्र से परिवार की खुशहाली तक, जानें पूजा विधि और मान्यता

जयपुर: भाद्रपद कृष्ण पक्ष की नवमी को मनाई जाने वाली गोगा नवमी इस साल 5 सितंबर, शनिवार को है। यह पर्व लोकदेवता गोगाजी महाराज को समर्पित है और राजस्थान, हरियाणा, पंजाब समेत हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में विशेष आस्था के साथ मनाया जाता है। गोगाजी को नागों के देवता के रूप में पूजा जाता है। उन्हें जाहरवीर गोगा राणा और जाहरपीर गोगाजी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन नाग पूजन के साथ गोगाजी की आराधना की जाती है। महिलाएं संतान की लंबी उम्र और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं।

लोकदेवता गोगाजी से जुड़ी है गहरी आस्था

मान्यता के अनुसार, योग, तप और मंत्र साधना से प्राप्त सिद्धियों के कारण गोगाजी को राजस्थान के प्रमुख लोकदेवताओं में स्थान मिला। गोगा नवमी पर भक्त उनकी पूजा-अर्चना कर परिवार की रक्षा और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

इस पर्व की खासियत यह है कि अलग-अलग क्षेत्रों में गोगाजी की पूजा स्थानीय परंपराओं के अनुसार की जाती है। कहीं दीवार पर उनका प्रतीक बनाया जाता है तो कहीं घोड़े पर सवार गोगाजी के स्वरूप की पूजा की जाती है।

ऐसे करें गोगा नवमी की पूजा

गोगा नवमी के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और गोगाजी का ध्यान करते हुए व्रत और पूजा का संकल्प लें। इसके बाद घर की रसोई की दीवार पर हल्दी और चंदन से गोगाजी का प्रतीक बनाया जाता है। इस प्रतीक में तवे की कालिख या कोयले से रंग भरने की भी परंपरा है।

कई जगह महिलाएं मिट्टी से वीर गोगाजी की प्रतिमा तैयार करती हैं। वहीं कुछ स्थानों पर घोड़े पर सवार गोगाजी की मूर्ति की पूजा की जाती है। पूजा में जांटी की टहनी या गोगा के नाम से पहचाने जाने वाले पौधे को भी शामिल किया जाता है।

गोगादेव को खीर, चूरमा और गुलगुले जैसे पकवानों का भोग लगाया जाता है। इस दिन नाग देवता की पूजा भी की जाती है और परिवार की सुरक्षा व सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। जहां घोड़े पर सवार गोगाजी की पूजा होती है, वहां घोड़े को दाल खिलाने की परंपरा भी बताई जाती है।

राखी उतारकर गोगाजी को अर्पित करने की परंपरा

गोगा नवमी से जुड़ी एक खास मान्यता रक्षाबंधन की राखी को लेकर भी है। मान्यता के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन भाई की कलाई पर बांधी गई राखी गोगा नवमी के दिन उतारकर गोगाजी को अर्पित की जाती है।

इसके साथ भाई और पूरे परिवार की रक्षा की प्रार्थना की जाती है। इस परंपरा के पीछे परिवार की सुरक्षा और मंगल की कामना जुड़ी मानी जाती है।

जांटी के पौधे की पूजा क्यों होती है?

गोगा नवमी की पूजा में जांटी के पौधे की टहनी का भी विशेष महत्व बताया गया है। खेतों में खर-पतवार के रूप में उगने वाले जांटी के पौधे की टहनी या गोगा नाम से पहचाने जाने वाले पौधे को घर लाकर पूजा करने की परंपरा है। इसे गोगाजी का प्रतीक माना जाता है।

पूजा के बाद शाम के समय इस टहनी या पौधे को नदी या तालाब में प्रवाहित करने की परंपरा भी कई जगह देखने को मिलती है। हरियाणा में गोगा के पौधे को आमतौर पर अपामार्ग, लटजीरा या चिरचिटा के नाम से जाना जाता है। इसमें औषधीय गुण भी पाए जाते हैं और स्थानीय परंपरा में इसे गोगा नवमी से जोड़कर देखा जाता है।

संतान की लंबी उम्र के लिए रखती हैं व्रत

गोगा नवमी पर महिलाएं संतान की लंबी उम्र, सुख और परिवार की समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं। संतान की इच्छा रखने वाले दंपति भी गोगाजी की पूजा करके अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।

लोक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से गोगाजी की पूजा करने से भक्तों की इच्छाएं पूरी होती हैं। इसी आस्था के कारण इस पर्व का विशेष महत्व बना हुआ है।

गोगामेड़ी में लगता है बड़ा मेला

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के गोगामेड़ी में गोगाजी का प्रसिद्ध मंदिर है। गोगा नवमी के अवसर पर यहां बड़े मेले का आयोजन होता है। इस दौरान गोगाजी की छड़ी का विशेष महत्व रहता है।

भक्त छड़ी को कंधे पर रखकर नगर में प्रभातफेरी निकालते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में गोगा नवमी की रस्में और परंपराएं स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकती हैं, लेकिन पर्व के केंद्र में गोगाजी और नाग देवता के प्रति लोक आस्था ही रहती है।

vineet verma

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