वॉशिंगटन: अमेरिका और चीन के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की प्रतिस्पर्धा अब केवल बेहतर मॉडल और अत्याधुनिक चिप बनाने तक सीमित नहीं रह गई है। बिजली, डेटा सेंटर, पूंजी, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी इस दौड़ के अहम आधार बन चुके हैं। दोनों देश AI में वैश्विक बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं और इसी वजह से यह प्रतिस्पर्धा तकनीक के साथ-साथ आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण हो गई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत में भी AI का मुद्दा प्रमुखता हासिल कर चुका है। सितंबर 2026 की प्रस्तावित ट्रंप-शी वार्ता से पहले दोनों देशों के अधिकारियों के बीच AI को लेकर बातचीत शुरू हुई। अमेरिका ने गंभीर AI घटनाओं की स्थिति में दोनों देशों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव रखा है। मई 2026 में ट्रंप की चीन यात्रा के बाद चीन ने कहा था कि दोनों पक्षों के बीच AI पर रचनात्मक बातचीत हुई और सरकार-से-सरकार AI संवाद शुरू करने पर सहमति बनी। हालांकि, किसी AI संधि, चिप साझा करने के समझौते या व्यापक तकनीकी समझौते की घोषणा नहीं हुई थी।
अमेरिका अभी आगे, लेकिन चीन ने तेजी से घटाया अंतर
कुछ साल पहले तक AI की वैश्विक दौड़ में अमेरिका की बढ़त काफी स्पष्ट दिखाई देती थी। OpenAI, Google, Anthropic, Meta, Nvidia, Microsoft और Amazon जैसी कंपनियों ने अमेरिका को AI मॉडल, चिप, क्लाउड कंप्यूटिंग और पूंजी के क्षेत्र में मजबूत स्थिति दी है। यह बढ़त अभी भी मौजूद है, लेकिन चीन ने कई मोर्चों पर अंतर कम किया है।
स्टैनफोर्ड AI इंडेक्स 2026 के अनुसार 2025 में अमेरिकी संस्थानों ने 59 उल्लेखनीय AI मॉडल तैयार किए, जबकि चीन में ऐसे 35 मॉडल बने। हालांकि, मॉडल प्रदर्शन के मामले में तस्वीर तेजी से बदल रही है। फरवरी 2025 में DeepSeek-R1 ने कुछ परीक्षणों में शीर्ष अमेरिकी मॉडलों के समान प्रदर्शन किया। मार्च 2026 तक शीर्ष अमेरिकी और चीनी मॉडलों के बीच मापा गया प्रदर्शन अंतर केवल 2.7 प्रतिशत रह गया था। स्टैनफोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक मॉडल प्रदर्शन का अंतर अब लगभग समाप्त हो चुका है।
पूंजी के मामले में दोनों देशों के बीच अंतर अभी काफी बड़ा है। 2025 में अमेरिका में निजी AI निवेश लगभग 27.30 लाख करोड़ रुपये रहा, जबकि चीन में यह करीब 1.18 लाख करोड़ रुपये था। इस हिसाब से अमेरिकी निजी निवेश चीन से करीब 23 गुना अधिक रहा। अमेरिका में सिर्फ जनरेटिव AI में निजी निवेश लगभग 15.62 लाख करोड़ रुपये रहा। इसी साल अमेरिका में 1,953 नई वित्त पोषित AI कंपनियां थीं, जबकि चीन में यह संख्या 161 रही।
हालांकि, चीन की AI अर्थव्यवस्था को केवल निजी निवेश के आंकड़ों से देखना पूरी तस्वीर नहीं देता। स्टैनफोर्ड के मुताबिक 2000 से 2023 के बीच चीनी सरकारी गाइडेंस फंड्स ने AI कंपनियों में अनुमानित 17.57 लाख करोड़ रुपये लगाए थे। यह सरकारी समर्थन सामान्य निजी निवेश के आंकड़ों में उसी तरह दिखाई नहीं देता।
अमेरिका का मॉडल अलग, चीन की रणनीति में पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर
दोनों देशों की AI रणनीतियों में एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। अमेरिका में निजी पूंजी और बड़ी टेक कंपनियां AI विकास की प्रमुख ताकत हैं। चीन में निजी कंपनियों के साथ सरकारी पूंजी, औद्योगिक नीति और इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग को भी जोड़ा जा रहा है।
AI को बड़े स्तर पर चलाने के लिए सिर्फ शक्तिशाली एल्गोरिदम काफी नहीं हैं। इसके पीछे हजारों AI एक्सेलेरेटर, विशाल डेटा सेंटर, बिजली, कूलिंग सिस्टम, ट्रांसफॉर्मर, ट्रांसमिशन लाइन, एडवांस्ड पैकेजिंग और हाई-स्पीड नेटवर्क की जरूरत होती है। यानी AI अब केवल सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि एक बड़े भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर उद्योग भी बन चुका है।
गोल्डमैन सैक्स के अनुमान के मुताबिक चीन के डेटा सेंटरों की बिजली क्षमता 2025 में करीब 30 गीगावॉट तक पहुंचने की दिशा में थी, जो लगभग 30 प्रतिशत वृद्धि दर्शाती है। चीनी क्लाउड सेवा प्रदाताओं का पूंजीगत खर्च 2025 में करीब 65 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान था। शीर्ष चीनी इंटरनेट कंपनियों के 2026 में AI से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर 6.68 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने का अनुमान लगाया गया था। हालांकि, यह उस समय अनुमानित अमेरिकी हाइपरस्केलर खर्च का करीब 15 से 20 प्रतिशत ही था।
रॉयटर्स और ब्लूमबर्ग की रिपोर्टों के अनुसार चीन करीब 2 ट्रिलियन युआन यानी लगभग 28.2 लाख करोड़ रुपये का पांच वर्षीय राष्ट्रीय डेटा सेंटर कार्यक्रम तैयार कर रहा था। प्रस्तावित योजना में आपस में जुड़े कंप्यूटिंग हब बनाने और महत्वपूर्ण तकनीक में कम से कम 80 प्रतिशत घरेलू हार्डवेयर इस्तेमाल करने का लक्ष्य बताया गया था। हुआवेई जैसी चीनी कंपनियां इससे लाभान्वित हो सकती हैं। यह योजना विकास के चरण में बताई गई थी, इसलिए इसे पूरा हो चुका निवेश नहीं माना जा सकता।
AI की अगली लड़ाई GPU के साथ बिजली की भी
AI प्रतिस्पर्धा में अब सवाल केवल यह नहीं रह गया है कि किस देश के पास ज्यादा GPU हैं। एक बड़ा सवाल यह भी है कि उन GPU और डेटा सेंटरों को चलाने के लिए पर्याप्त बिजली किसके पास है।
ब्लूमबर्गएनईएफ के मुताबिक चीन अगले पांच वर्षों में 3.4 टेरावॉट से अधिक बिजली उत्पादन क्षमता जोड़ सकता है। यह अनुमानित अमेरिकी क्षमता वृद्धि से करीब छह गुना है। सिर्फ 2025 में चीन ने लगभग 543 गीगावॉट नई बिजली उत्पादन क्षमता जोड़ी। ब्लूमबर्ग के अनुसार 2021 के बाद चीन द्वारा जोड़ी गई कुल उत्पादन क्षमता अमेरिका की पूरी ऐतिहासिक स्थापित क्षमता से भी अधिक रही।
अमेरिका में भी डेटा सेंटरों और AI के कारण बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है। ब्लूमबर्गएनईएफ ने जुलाई 2026 में अनुमान लगाया था कि अमेरिकी डेटा सेंटरों की स्थापित क्षमता 2030 तक 118 गीगावॉट और 2035 तक 194 गीगावॉट हो सकती है। लेकिन बिजली कनेक्शन, ट्रांसफॉर्मर, परमिट और नई उत्पादन क्षमता जैसी चुनौतियां बाधा बन रही हैं।
गोल्डमैन सैक्स के अनुमान के मुताबिक अमेरिका में डेटा सेंटरों की बिजली मांग 2025 के 31 गीगावॉट से बढ़कर 2027 में 66 गीगावॉट हो सकती है। इससे साफ है कि AI की अगली प्रतिस्पर्धा में कंप्यूटिंग क्षमता के साथ बिजली उपलब्धता भी महत्वपूर्ण कारक बनने वाली है।
चीन का दूसरा दांव- सबसे शक्तिशाली नहीं, सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला AI
अमेरिका लंबे समय से फ्रंटियर AI मॉडल की क्षमता पर जोर देता रहा है। वहीं चीन की रणनीति का एक बड़ा हिस्सा AI को उद्योग और अर्थव्यवस्था के व्यापक हिस्से में पहुंचाने पर केंद्रित है।
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रोबोटिक्स के अनुसार 2024 में दुनिया में लगाए गए नए औद्योगिक रोबोटों में 54 प्रतिशत चीन में लगाए गए। चीन में करीब 2.95 लाख औद्योगिक रोबोट इंस्टॉल हुए और वहां इनका परिचालन स्टॉक 20 लाख से अधिक हो गया। पहली बार चीनी रोबोट निर्माताओं ने घरेलू बाजार में विदेशी सप्लायर्स को पीछे छोड़ा।
इस आंकड़े को सीधे AI अपनाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन यह चीन की औद्योगिक ऑटोमेशन क्षमता का महत्वपूर्ण संकेत है। AI और रोबोटिक्स के बढ़ते मेल के बीच यह क्षमता आगे महत्वपूर्ण हो सकती है।
चीन का ‘ईस्ट डेटा, वेस्ट कंप्यूटिंग’ कार्यक्रम भी इसी व्यापक रणनीति का उदाहरण है। इसके तहत पूर्वी चीन की डिजिटल मांग को पश्चिमी प्रांतों की जमीन, नवीकरणीय ऊर्जा और कंप्यूटिंग क्लस्टरों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। चीनी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश के आठ राष्ट्रीय कंप्यूटिंग हब में से पांच पश्चिमी क्षेत्रों में हैं।
अमेरिका ने चीन की AI क्षमता सीमित करने के लिए लगाए एक्सपोर्ट कंट्रोल
अमेरिका ने 2022 से चीन को अत्याधुनिक AI चिप और सेमीकंडक्टर निर्माण तकनीक तक पहुंच सीमित करने के लिए कई स्तरों पर निर्यात नियंत्रण लागू किए हैं। दिसंबर 2024 में अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने 24 तरह के सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरण, चिप विकास सॉफ्टवेयर की तीन श्रेणियों और हाई बैंडविड्थ मेमोरी पर नए नियंत्रण लगाए। इसके साथ 140 चीनी संस्थाओं को एंटिटी लिस्ट में जोड़ा गया।
अमेरिकी सरकार ने इन कदमों का उद्देश्य चीन की अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर और सैन्य AI क्षमताओं को सीमित करना बताया था। दूसरी ओर, इन प्रतिबंधों से चीन के घरेलू चिप उद्योग में निवेश का प्रोत्साहन बढ़ने की संभावना भी बनी है।
Nvidia जैसी अमेरिकी कंपनियों की अत्याधुनिक तकनीक और पश्चिमी मेमोरी तथा लिथोग्राफी उपकरणों तक सीमित पहुंच के बीच Huawei, SMIC और अन्य घरेलू कंपनियों के विकल्प विकसित करना चीन के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
जून 2026 में Meituan ने दावा किया था कि उसका LongCat-2.0 मॉडल 50,000 चीनी निर्मित प्रोसेसर वाले क्लस्टर पर प्रशिक्षित किया गया। कंपनी ने इसे ट्रिलियन-पैरामीटर स्तर पर पूरी तरह घरेलू प्रोसेसर इस्तेमाल करने वाला पहला सिस्टम बताया था। हालांकि, चिप सप्लायर का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया था, इसलिए इस दावे से जुड़े तकनीकी विवरणों को कंपनी के दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
सितंबर में Alibaba ने अपना नया Zhenwu V900 AI चिप पेश किया और कहा कि Alibaba Cloud की डेटा सेंटर क्षमता को 2032 तक 20 गीगावॉट से अधिक करने का लक्ष्य है। इससे संकेत मिलता है कि चीन AI के लिए घरेलू चिप, क्लाउड और डेटा सेंटर क्षमता को एक साथ विकसित करने पर जोर दे रहा है।
AI की दौड़ अब सैन्य और रणनीतिक ताकत से भी जुड़ी
AI का इस्तेमाल अब सैन्य खुफिया, साइबर सुरक्षा, ड्रोन, निगरानी, स्वायत्त प्रणालियों, वैज्ञानिक अनुसंधान और महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में बढ़ रहा है। इसी वजह से AI को लेकर अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा केवल आर्थिक या तकनीकी मुद्दा नहीं रह गई है।
अमेरिकी AI नीति में भी AI नेतृत्व को आर्थिक प्रतिस्पर्धा, राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव से जोड़ा गया है। अमेरिका ने ‘American AI Exports Program’ शुरू किया है, जिसके तहत सहयोगी और साझेदार देशों तक केवल AI मॉडल पहुंचाने के बजाय चिप, सर्वर, क्लाउड, डेटा सिस्टम, साइबर सुरक्षा, एप्लिकेशन और तकनीकी मानकों से जुड़ा पूरा इकोसिस्टम पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।
आने वाले वर्षों में एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व के देश AI इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करेंगे। ऐसे में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि वे अमेरिकी चिप, क्लाउड और मॉडल आधारित व्यवस्था अपनाते हैं या चीनी हार्डवेयर, ओपन मॉडल और कम लागत वाले इंफ्रास्ट्रक्चर की ओर जाते हैं। इससे तकनीकी बाजार के साथ सप्लाई चेन, डेटा आर्किटेक्चर और तकनीकी मानकों पर भी असर पड़ सकता है।
ट्रंप-शी की AI बातचीत का असली महत्व क्या है?
अमेरिका और चीन के बीच AI संवाद को केवल AI सुरक्षा वार्ता के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। सार्वजनिक रूप से बातचीत गंभीर AI घटनाओं की सूचना, स्वायत्त प्रणालियों, साइबर सुरक्षा और दोनों देशों के बीच संचार व्यवस्था जैसे मुद्दों पर केंद्रित हो सकती है। इसके पीछे बड़ा सवाल यह है कि दोनों देश AI प्रतिस्पर्धा को किस हद तक नियंत्रित कर सकते हैं, जबकि दोनों ही इस तकनीक में अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
रॉयटर्स के मुताबिक सितंबर की तैयारियों से जुड़ी बातचीत में AI सुरक्षा संबंधी सूचना साझा करने की व्यवस्था का मुद्दा सामने आया था। ऐसे में अमेरिका-चीन AI प्रतिस्पर्धा के सामने एक साथ दो लक्ष्य हैं—तकनीकी बढ़त हासिल करना और यह सुनिश्चित करना कि AI से जुड़ी प्रतिस्पर्धा सैन्य, साइबर या अन्य गंभीर संकट में न बदल जाए।