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रूसी तेल का धंधा: भारतीय लोगों के लिए महंगा तो किसके लिए मुनाफे का सौदा ?

news desk
Last updated: August 23, 2025 9:50 am
news desk
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रूसी तेल का धंधा
रूसी तेल का धंधा
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रूस से कच्चा तेल खरीदने के चलते अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया. अमेरिका का आरोप था कि भारत रूस के सबसे बड़े तेल खरीददारों में से एक है. भारत के तेल खरीदने से रूस की जो कमाई हो रही है उससे रूस यक्रेन की जंग लड़ रहा है. वहीं भारत का कहना है कि अगर रूस से तेल खरीदने में भारत का फायदा है तो हम खरीदेंगे. यहीं से सवाल उठने लगा कि जब भारत को रूस से क्रूड ऑयल सस्ते में मिल रहा है तो फिर भारतीय उपभोक्ताओं यानी आम लोगों को इतना महंगा पेट्रोल क्यों खरीदना पड़ रहा है? जब लोगों का फायदा नहीं हो रहा है तो भारत में रूस के तेल से किसे फायदा पहुंच रहा है?

रूस के सस्ते तेल से किसको फायदा?

2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद, अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाते हुए उसके तेल पर $60 प्रति बैरल की मूल्य सीमा लगा दी थी. जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति भी बनी रहे और रूसी अर्थव्यवस्था पर चोट भी की जा सके. जिसके बाद मजबूरी में रूस को भारत और चीन जैसे देशों को 4–5 डॉलर की छूट पर अपना तेल बेचना पड़ रहा था. विश्लेषकों की माने तो भारत को इससे काफी लाभ हुआ था, विशेषकर कुछ बड़े व्यावसायिक घरानों को. इसमें मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज का नाम सबसे ऊपर आता है, जिसने इस सस्ते तेल को बड़े पैमाने पर खरीदा था. 2021 में जहां रिलायंस का रूस से कुल आयात मात्र 3% था, वहीं 2025 में यह बढ़कर 50% तक पहुंच गया. हालांकि यह आश्चर्य की बात है कि इससे भारत की आम जनता को कोई फायदा नहीं पहुंचा.

जामनगर रिफाइनरी: अंबानी के मुनाफे की मशीन

दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी है, जहां पर ‘शैडो फ्लीट’  से रूस से आयातित सस्ते कच्चे तेल को रिफाइन कर पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन में बदला जाता है. फिर इन्हें अमेरिका और यूरोप जैसे उन्हीं देशों को बेचा जाता है जिन्होंने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं. 2023 से 2025 के बीच रिलायंस ने $85.9 अरब के रिफाइंड उत्पादों का निर्यात किया, जिनमें से $36 अरब का माल उन्हीं देशों को गया जिन्होंने रूस से तेल खरीदने से मना किया था.

जनता को सस्ता पेट्रोल क्यों नहीं?

जब तेल सस्ता खरीदा जा रहा है, तो फिर भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें क्यों नहीं घट रहीं? इसका कारण है —कॉरपोरेट मुनाफाखोरी. जहां रिलायंस जैसे उद्योगपति सस्ते तेल को महंगे उत्पाद में बदलकर विदेशों में बेचकर अरबों कमा रहे हैं, वहीं भारतीय जनता आज भी दिल्ली में 94–100 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल खरीदने को मजबूर है. सरकार इस पर कोई स्पष्ट सब्सिडी या लाभ भी जनता तक नहीं पहुंचा रही है. यह सवाल तब और भी गंभीर हो जाता है जब अमेरिकी वित्त मंत्री ने खुद कहा कि भारत के कुछ बड़े उद्योगपतियों ने इस रूसी तेल से $16 अरब का ‘अतिरिक्त मुनाफा’ कमाया.

ट्रम्प का 500% टैरिफ का खतरा

अमेरिका ने एक नया बिल पेश किया है—‘Sanctioning Russia Act 2025’, जो उन देशों पर 500% टैरिफ लगाने का प्रावधान करता है जो रूस से तेल खरीदते हैं. अगर यह लागू होता है, तो भारत के निर्यात उद्योग—खासकर टेक्सटाइल, जेम्स और इलेक्ट्रॉनिक्स पर भारी असर पड़ेगा. पहले से ही ट्रम्प 25% टैरिफ लगा चुके हैं, जो 27 अगस्त 2025 से बढ़कर 50% हो जाएगा. मूडीज जैसी एजेंसियों ने चेतावनी भी दी है कि इससे भारत की GDP में 0.3–0.8% तक की गिरावट आ सकती है.

भारत की रणनीति या खेल?

सवाल यह है कि भारत की यह नीति सिर्फ अंबानी जैसे बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए है ? या फिर यह एक दीर्घकालिक रणनीति है, जिससे भारत अपने चालू खाता घाटे को नियंत्रित कर रहा है और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है? या फिर विपक्ष के आरोप सहीं हैं ?

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