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‘टोपी’ पर यूटर्न लेकर नीतीश ने किसे दिया संदेश, किस ओर करवट लेने जा रही है बिहार की राजनीति?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने गठबंधन के सहयोगियों को असमंजस में डालने के लिए जाने जाते हैं. उनको लेकर ये सवाल हमेशा चर्चा में रहता है कि वो अपने वर्तमान सहयोगियों के साथ कितने दिन बने रहेंगे. फिलहाल तो नीतीश कुमार बीजेपी के साथ हैं. बिहार में उनकी सरकार भी चल रही है. लेकिन गुरूवार को नीतीश कुमार ने कुछ ऐसा कर दिया जो उनकी 45 साल की राजनीति में कभी नहीं देखा गया. उनके काम की चर्चा के साथ बिहार की राजनीति में नई करवट भी देखी जा रही है.

मौका था मदरसा एजुकेशन बोर्ड के शताब्दी वर्ष समारोह का. कार्यक्रम के दौरान कुछ लोगों ने नीतीश को टोपी पहनाने की कोशिश की. लेकिन नीतीश ने मना कर दिया. ये लोगों को अचरज में डाल गया. बिहार में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस पर निशाना साधता हुए कहा कि ‘नीतीश कुमार ने जबरन मदरसा शिक्षकों को बुलाया और सम्मान स्वरूप टोपी पहनने से इंकार कर दिया’. वैसे तो इस कार्यक्रम में शिक्षकों ने सैलरी की मांग को लेकर नारेबाजी भी की. लेकिन चर्चा नीतीश के टोपी नहीं पहनने को लेकर ही ज्यादा हो रही है. क्योंकि अगले कुछ महीनों में बिहार में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं.

2011 से 2025 तक कितने बदले नीतीश?

बिहार में लगभग 17 फीसदी मुस्लिम मतदाता है. बीजेपी के साथ रहने के बावजूद नीतीश कुमार मुस्लिम मतदाताओं का कुछ हिस्सा पाते रहे हैं. जेडीयू की अपनी पहचान रही है, मुस्लिम वर्ग में उसकी स्वीकार्यता भी देखी जाती रही है. क्योंकि नीतीश बीजेपी के साथ रहते हुए भी अपनी छवि सेक्यूलर बना कर चले. 2011 में उन्होने एक मंच से कहा था कि ‘राजनीति में कभी टीका भी लगाना पड़ता है तो कभी टोपी भी पहनना पड़ता है’. नीतीश के इस बयान की बहुत चर्चा हुई थी. माना गया था कि ये बयान उन्होने अपने सहयोगियों को लेकर दिया था.

कौन सी खिचड़ी पका रहे हैं नीतीश?

अब नीतीश कुमार के टोपी नहीं पहनने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं, जैसे क्या उन्होने बीजेपी के दवाब में टोपी से दूरी बनाई ? हालांकि नीतीश अभी तक तो कभी दवाब में नहीं दिखे. ये माना जा रहा है कि पिछले कुछ समय से उनकी पार्टी के ज्यादातर सांसद बीजेपी के पाले में हैं. तो क्या जेडीयू नीतीश के हाथ से निकल रही है? वहीं कुछ लोगों का मानना है कि नीतीश के इस कदम से अगामी चुनाव में मुस्लिम मतदाता एकजुट महागठबंधन की तरफ जा सकता है. पिछले विधानसभा चुनाव में खासकर सीमांचल में मुस्लिम मतों में बिखराव होने से महागठबंधन को नुकसान हुआ था और वो सरकार बनाने से चूक गई थी. तो क्या नीतीश बीजेपी के साथ रहते हुए महागठबंधन की मदद कर रहे हैं? क्योंकि बिहार SIR के मुद्दे पर बताया जाता है कि नीतीश कुमार भी नाराज हैं. औऱ जिस तरह से राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की वोटर अधिकार यात्रा को लोगों का समर्थन मिल रहा है उसे देख कर कयास लगाए जा रहे हैं कि जल्द ही बिहार की राजनीति एक बार फिर करवट लेने जा रही है.

news desk

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