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Probiotics क्या हैं? पेट की सेहत से इम्यूनिटी तक मिलते हैं ये फायदे, जानें सप्लीमेंट लेने का सही तरीका और नुकसान

नई दिल्ली: पेट में गैस, कब्ज, पेट फूलने और पाचन से जुड़ी परेशानियों के बीच इन दिनों प्रोबायोटिक्स (Probiotics) की खूब चर्चा हो रही है। कभी ये दही और योगर्ट के पैकेट पर लिखे नजर आते हैं तो कभी पेट की सेहत सुधारने वाले सप्लीमेंट के तौर पर इनका प्रचार किया जाता है। प्रोबायोटिक्स दरअसल कुछ खास तरह के जीवित बैक्टीरिया और यीस्ट होते हैं, जो शरीर में सूक्ष्मजीवों का संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। इनका सबसे ज्यादा संबंध हमारी आंतों और पाचन तंत्र की सेहत से है।

कुछ प्रोबायोटिक स्ट्रेन पाचन संबंधी परेशानियों, एंटीबायोटिक्स के कारण होने वाले दस्त और इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकती हैं। इनके जरिए इम्यून सिस्टम को भी सहारा मिल सकता है। लेकिन क्या हर व्यक्ति को प्रोबायोटिक सप्लीमेंट लेना चाहिए? क्या इनके कुछ नुकसान भी हैं और इन्हें इस्तेमाल करने का सही तरीका क्या है? आइए विस्तार से समझते हैं।

क्या होते हैं प्रोबायोटिक्स?

प्रोबायोटिक्स जीवित सूक्ष्मजीव (Microorganisms) होते हैं। इनमें कुछ फायदेमंद बैक्टीरिया और खास तरह के यीस्ट शामिल हैं। जब इन्हें पर्याप्त मात्रा में शरीर में पहुंचाया जाता है, तो ये स्वास्थ्य को लाभ पहुंचा सकते हैं। हमारे शरीर में पहले से ही लाखों-करोड़ों सूक्ष्मजीव मौजूद होते हैं। इनमें कुछ शरीर के लिए उपयोगी होते हैं, जबकि कुछ नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। प्रोबायोटिक्स इन सूक्ष्मजीवों के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।

अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (NIH) के तहत आने वाले ऑफिस ऑफ डाइटरी सप्लीमेंट्स (ODS) के मुताबिक, पर्याप्त मात्रा में दिए जाने पर स्वास्थ्य लाभ पहुंचाने वाले जीवित सूक्ष्मजीवों को प्रोबायोटिक्स कहा जाता है।

लैक्टोबैसिलस, बिफिडोबैक्टीरियम और सैकरोमाइसिस बोलार्डी इसके कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। हालांकि, सभी प्रोबायोटिक्स का काम एक जैसा नहीं होता। अलग-अलग बैक्टीरिया और यीस्ट की स्ट्रेन शरीर में अलग-अलग तरीके से असर कर सकती हैं।

शरीर में क्या काम करते हैं प्रोबायोटिक्स?

हमारी आंतों में कई तरह के सूक्ष्मजीव रहते हैं। इन सभी के समूह को गट माइक्रोबायोम (Gut Microbiome) कहा जाता है। ये सूक्ष्मजीव सिर्फ भोजन पचाने में ही मदद नहीं करते, बल्कि पोषक तत्वों के अवशोषण और इम्यून सिस्टम को सही तरीके से काम करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।

NIH के मुताबिक, प्रोबायोटिक्स आंतों में हानिकारक सूक्ष्मजीवों की संख्या को नियंत्रित करने, कुछ उपयोगी पदार्थों का उत्पादन करने और आंतों की अंदरूनी सुरक्षा परत को मजबूत बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। कुछ प्रोबायोटिक स्ट्रेन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की गतिविधियों को भी प्रभावित करती हैं। हालांकि, इनका असर इस्तेमाल की जाने वाली प्रजाति और स्ट्रेन पर निर्भर करता है।

प्रोबायोटिक्स लेने से सेहत को क्या फायदे मिल सकते हैं?

1. पाचन तंत्र को बेहतर रखने में मदद

प्रोबायोटिक्स का सबसे प्रमुख संबंध पेट और पाचन तंत्र की सेहत से है। ये आंतों में अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बनाए रखने और भोजन से मिलने वाले कुछ पोषक तत्वों के अवशोषण में मदद कर सकते हैं। कुछ खास प्रोबायोटिक स्ट्रेन कब्ज, गैस, पेट फूलने और इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) जैसी समस्याओं के लक्षणों को कम करने में भी उपयोगी हो सकती हैं।

2. एंटीबायोटिक्स से होने वाले दस्त का खतरा घटा सकते हैं

संक्रमण के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं हानिकारक बैक्टीरिया के साथ आंतों में मौजूद कुछ अच्छे बैक्टीरिया को भी प्रभावित कर सकती हैं। इससे कई बार दस्त की समस्या होने लगती है। NIH की रिसर्च समीक्षा के मुताबिक, कुछ खास प्रोबायोटिक स्ट्रेन एंटीबायोटिक्स से जुड़े दस्त (Antibiotic-associated diarrhea) का जोखिम कम कर सकती हैं।

इनमें लैक्टोबैसिलस रहमनोसस GG और सैकरोमाइसिस बोलार्डी शामिल हैं। हालांकि, इनका फायदा व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और इस्तेमाल की जाने वाली स्ट्रेन पर निर्भर करता है।

3. इम्यूनिटी को बेहतर तरीके से काम करने में कर सकते हैं मदद

आंतों और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के बीच गहरा संबंध होता है। आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया इम्यून सिस्टम को सामान्य रूप से काम करने में मदद करते हैं। NIH के ऑफिस ऑफ डाइटरी सप्लीमेंट्स के मुताबिक, कुछ प्रोबायोटिक्स आंतों की सुरक्षा परत को मजबूत बनाने, इम्युनोग्लोबुलिन के उत्पादन को बढ़ावा देने और शरीर की कुछ प्रतिरक्षा गतिविधियों को बेहतर बनाने में भूमिका निभा सकते हैं।

हालांकि, प्रोबायोटिक्स को संक्रमण से पूरी तरह बचाने या इम्यूनिटी बढ़ाने की गारंटी नहीं माना जा सकता।

4. IBS और पेट फूलने की समस्या में राहत

इरिटेबल बाउल सिंड्रोम यानी IBS से परेशान लोगों को अक्सर पेट दर्द, गैस, पेट फूलने और मल त्याग की आदतों में बदलाव जैसी समस्याएं होती हैं। कुछ खास प्रोबायोटिक स्ट्रेन इन लक्षणों को कम करने में मदद कर सकती हैं।

NIH की फैक्टशीट में शामिल एक मेटा-एनालिसिस में 2,575 लोगों पर किए गए 23 रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल (RCTs) के नतीजों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि प्रोबायोटिक्स लेने वाले लोगों में IBS के लक्षण बने रहने या उनमें सुधार न होने का जोखिम करीब 21 फीसदी कम था। हालांकि, रिसर्च में शामिल अध्ययनों की गुणवत्ता सीमित थी और अलग-अलग प्रोबायोटिक स्ट्रेन का असर भी एक जैसा नहीं पाया गया।

5. आंतों की सुरक्षा परत को मजबूत बनाने में मदद

आंतों की अंदरूनी परत शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले सूक्ष्मजीवों और हानिकारक पदार्थों से बचाने में अहम भूमिका निभाती है। कुछ प्रोबायोटिक्स इस परत को मजबूत बनाए रखने और म्यूकस (Mucus) के उत्पादन को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं। इससे आंतों की प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था को सहारा मिलता है।

किन खाद्य पदार्थों में पाए जाते हैं प्रोबायोटिक्स?

प्रोबायोटिक्स पाने के लिए हर बार महंगे सप्लीमेंट खरीदना जरूरी नहीं है। रोजमर्रा के खानपान में शामिल कुछ फर्मेंटेड खाद्य पदार्थ भी जीवित और फायदेमंद सूक्ष्मजीवों के स्रोत हो सकते हैं।

  • दही और योगर्ट: इनमें जीवित और सक्रिय बैक्टीरिया की कुछ प्रजातियां मौजूद हो सकती हैं।
  • केफिर (Kefir): यह फर्मेंटेड दूध से तैयार होने वाला पेय है, जिसमें कई तरह के सूक्ष्मजीव हो सकते हैं।
  • छाछ: पारंपरिक तरीके से तैयार की गई छाछ में भी फायदेमंद बैक्टीरिया हो सकते हैं।
  • किमची (Kimchi): यह फर्मेंटेड सब्जियों से तैयार होने वाला कोरियाई खाद्य पदार्थ है।
  • सॉकरक्रॉट (Sauerkraut): इसे फर्मेंटेड पत्तागोभी से बनाया जाता है।
  • मिसो (Miso): यह फर्मेंटेड सोयाबीन से तैयार होने वाला जापानी खाद्य पदार्थ है।
  • टेम्पेह (Tempeh): यह भी फर्मेंटेड सोयाबीन से तैयार किया जाता है।

NIH के अनुसार, दही और कुछ अन्य फर्मेंटेड खाद्य पदार्थ जीवित सूक्ष्मजीवों के स्रोत हो सकते हैं। हालांकि, हर फर्मेंटेड फूड में फायदेमंद प्रोबायोटिक सूक्ष्मजीव मौजूद हों, यह जरूरी नहीं है। खाद्य पदार्थों की प्रोसेसिंग और गर्म करने की प्रक्रिया से भी जीवित बैक्टीरिया नष्ट हो सकते हैं। इसलिए उत्पाद खरीदते समय ‘लाइव एंड एक्टिव कल्चर्स’ का लेबल देखना बेहतर है।

प्रोबायोटिक सप्लीमेंट लेने का सही तरीका क्या है?

प्रोबायोटिक सप्लीमेंट लेने से पहले यह समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति को इनकी जरूरत नहीं होती। अगर आपको पेट से जुड़ी कोई परेशानी है या एंटीबायोटिक्स लेने के दौरान डॉक्टर ने प्रोबायोटिक्स की सलाह दी है, तो सही सप्लीमेंट का चुनाव फायदेमंद हो सकता है।

वर्ल्ड गैस्ट्रोएंटरोलॉजी ऑर्गनाइजेशन (WGO) के दिशानिर्देशों के मुताबिक, प्रोबायोटिक्स की सही मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें कौन-सी स्ट्रेन मौजूद है और किस स्वास्थ्य समस्या के लिए उसका इस्तेमाल किया जा रहा है। सप्लीमेंट खरीदते समय इन बातों का ध्यान रखें:

  • स्ट्रेन की जानकारी देखें: सप्लीमेंट में कौन-सी बैक्टीरिया या यीस्ट स्ट्रेन मौजूद है, इसकी जानकारी जरूर जांचें।
  • CFU की मात्रा समझें: CFU यानी Colony Forming Units से पता चलता है कि सप्लीमेंट में कितने जीवित सूक्ष्मजीव मौजूद हैं। ज्यादा CFU होने का मतलब हमेशा ज्यादा फायदा नहीं होता।
  • एक्सपायरी डेट जांचें: उत्पाद की एक्सपायरी और इस्तेमाल की आखिरी तारीख जरूर देखें।
  • स्टोरेज की जानकारी पढ़ें: कुछ प्रोबायोटिक्स को फ्रिज में रखना जरूरी होता है, जबकि कुछ सामान्य तापमान पर भी रखे जा सकते हैं। पैकेट पर दिए निर्देशों का पालन करें।
  • डॉक्टर की सलाह लें: अपनी जरूरत और स्वास्थ्य स्थिति के मुताबिक सही सप्लीमेंट और उसकी मात्रा तय करने के लिए डॉक्टर से बात करें।

NIH की फैक्टशीट के मुताबिक, प्रोबायोटिक्स के असर के लिए उनकी स्ट्रेन और जीवित सूक्ष्मजीवों की संख्या दोनों महत्वपूर्ण हैं। कुछ उत्पादों में एक तरह की स्ट्रेन होती है, जबकि कुछ में कई स्ट्रेन का मिश्रण होता है। सप्लीमेंट के लेबल पर यह भी देखना चाहिए कि CFU की बताई गई संख्या एक्सपायरी डेट तक कितनी बनी रहने की गारंटी है।

क्या प्रोबायोटिक्स के कोई नुकसान भी हैं?

आमतौर पर स्वस्थ लोगों के लिए प्रोबायोटिक्स सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन कुछ लोगों को इनके सेवन की शुरुआत में गैस, पेट फूलना, दस्त या पेट में हल्की परेशानी हो सकती है। ये लक्षण अधिकतर कुछ समय बाद ठीक हो जाते हैं।

हालांकि, गंभीर रूप से बीमार लोगों और कमजोर इम्यूनिटी वाले मरीजों को प्रोबायोटिक्स के इस्तेमाल में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। NIH के मुताबिक, ऐसे लोगों में प्रोबायोटिक्स के कारण संक्रमण का खतरा हो सकता है। कुछ दुर्लभ मामलों में इनके इस्तेमाल के बाद खून में बैक्टीरिया या फंगस का संक्रमण भी सामने आया है।

समय से पहले जन्मे बच्चों में भी प्रोबायोटिक्स के इस्तेमाल को लेकर खास सावधानी जरूरी है। ऐसे लोगों को डॉक्टर की सलाह के बिना प्रोबायोटिक सप्लीमेंट नहीं लेना चाहिए।

क्या रोजाना प्रोबायोटिक्स लेना जरूरी है?

नहीं, हर किसी के लिए रोजाना प्रोबायोटिक सप्लीमेंट लेना जरूरी नहीं है। अगर आप स्वस्थ हैं और आपकी डाइट में फल, सब्जियां, फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ और फर्मेंटेड फूड शामिल हैं, तो आपको अलग से सप्लीमेंट लेने की जरूरत शायद न पड़े।

NIH के अनुसार, स्वस्थ लोगों के लिए प्रोबायोटिक सप्लीमेंट के नियमित इस्तेमाल को लेकर फिलहाल कोई आधिकारिक सिफारिश नहीं है। हालांकि, कुछ खास स्वास्थ्य समस्याओं में डॉक्टर किसी विशेष प्रोबायोटिक स्ट्रेन के इस्तेमाल की सलाह दे सकते हैं। इसलिए बिना जरूरत सप्लीमेंट लेने के बजाय संतुलित खानपान पर ध्यान देना बेहतर है।

डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। प्रोबायोटिक सप्लीमेंट का सेवन शुरू करने से पहले डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

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