ढाका: बांग्लादेश एक बार फिर हिंसक प्रदर्शनों और राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। कहीं महंगाई, बिजली और ईंधन संकट को लेकर लोग सड़कों पर हैं, तो कहीं कपड़ा उद्योग के कर्मचारी वेतन बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। इन प्रदर्शनों के दौरान सड़कें जाम की जा रही हैं और वाहनों में तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आई हैं। लेकिन इन सबके बीच एक बात खास तौर पर ध्यान खींच रही है। प्रदर्शन बांग्लादेश की सरकार के खिलाफ हो रहे हैं, मगर निशाने पर भारत भी है। 30 अक्टूबर को ढाका में नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) की रैली में ‘दिल्ली ना ढाका? ढाका, ढाका’ के नारे लगाए गए। इस नारे के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई कि बांग्लादेश के फैसले दिल्ली नहीं, बल्कि ढाका में होने चाहिए। सवाल है कि बांग्लादेश के अंदरूनी राजनीतिक और आर्थिक संकट के बीच भारत बार-बार निशाने पर क्यों आ रहा है?
बांग्लादेश में मौजूदा विरोध प्रदर्शनों की वजहें घरेलू हैं। महंगाई, रोजगार, वेतन और आर्थिक मुश्किलों ने लोगों की नाराजगी बढ़ाई है। इसके बावजूद कुछ राजनीतिक संगठनों और नेताओं के बयानों में भारत विरोध भी प्रमुखता से दिखाई देता है। इसके पीछे कई ऐसे मुद्दे हैं, जिनका संबंध दोनों देशों के राजनीतिक और कूटनीतिक रिश्तों से है।
बांग्लादेश में भारत विरोधी नारों के पीछे सबसे प्रमुख मुद्दों में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का भारत में रहना शामिल है। साल 2024 में बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद शेख हसीना की सरकार गिर गई थी। इसके बाद उन्हें बांग्लादेश छोड़ना पड़ा और उन्होंने भारत में शरण ली।
बांग्लादेश के कुछ राजनीतिक दलों और छात्र संगठनों को शेख हसीना का भारत में रहना पसंद नहीं है। इन संगठनों का आरोप है कि भारत उन्हें संरक्षण देकर बांग्लादेश की राजनीति में दखल दे रहा है। इसी वजह से शेख हसीना का मुद्दा भारत के खिलाफ राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा बन गया है।
दिसंबर 2026 में शेख हसीना की संभावित वापसी को लेकर भी चर्चाएं हो रही हैं। ऐसे में यह मुद्दा फिर से बांग्लादेश की राजनीति में उठाया जा रहा है। कुछ राजनीतिक समूह इसे भारत के खिलाफ माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे को लेकर 1996 में 30 साल का समझौता हुआ था। इसकी अवधि 12 दिसंबर 2026 को पूरी होने वाली है। ऐसे में दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है।
बांग्लादेश में कुछ राजनीतिक दल और नेता चाहते हैं कि नए समझौते में उनके देश को गंगा के पानी में पहले से ज्यादा हिस्सेदारी मिले। नेशनल सिटिजन पार्टी के नेता नाहिद इस्लाम भी इस मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर बांग्लादेश को उसके हिस्से का पानी नहीं मिला तो फिर से फरक्का मार्च किया जा सकता है।
नाहिद इस्लाम ने यह भी कहा है कि पानी के मुद्दे पर बांग्लादेश की मांग नहीं मानी गई तो भारत को मिलने वाली ट्रांजिट सुविधाओं पर भी सवाल उठ सकते हैं। इस तरह जल बंटवारे का पुराना विवाद अब दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर रहा है।
बांग्लादेश और जापान के बीच औद्योगिक तथा परिवहन ढांचे को मजबूत करने से जुड़ी योजनाएं भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गई हैं। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने 26 अक्टूबर को जापान का दौरा किया था। इस दौरान दोनों देशों के बीच कई परियोजनाओं पर चर्चा हुई।
इनमें कॉक्स बाजार स्थित मातरबाड़ी डीप सी पोर्ट की भूमिका अहम मानी जा रही है। जापान की एक प्रस्तावित योजना के तहत बांग्लादेश के रास्ते भारत के पूर्वोत्तर के सात राज्यों को बंगाल की खाड़ी से जोड़ने की बात है। इससे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक व्यापारिक पहुंच बेहतर हो सकती है।
हालांकि, बांग्लादेश के कुछ विपक्षी नेता इस प्रस्ताव पर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि कनेक्टिविटी परियोजना के नाम पर भारत को बांग्लादेश के रास्ते विशेष सुविधाएं देने की कोशिश हो रही है। इस मुद्दे को लेकर वे अपनी ही सरकार को घेर रहे हैं और इसे भारत के कथित बढ़ते प्रभाव से जोड़ रहे हैं।
बांग्लादेश इस समय कई आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहा है। देश का रेडीमेड गारमेंट उद्योग अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है, लेकिन इस क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। साल 2023 के बाद से न्यूनतम वेतन में बदलाव नहीं हुआ है। महंगाई और आर्थिक सुस्ती के बीच कर्मचारियों की नाराजगी लगातार बढ़ रही है।
3 नवंबर तक कम से कम 690 गारमेंट फैक्ट्रियों में उत्पादन बंद होने की खबर सामने आई थी। इससे बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और सरकार पर दबाव बढ़ा है।
ऐसे हालात में विपक्षी दल सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं। इसी दौरान कुछ नेता भारत पर बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के आरोप भी लगा रहे हैं। इस तरह घरेलू आर्थिक और राजनीतिक असंतोष के बीच भारत का मुद्दा भी बहस में शामिल हो गया है।
साल 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। छात्र आंदोलन से जुड़े कई नेता बाद में नेशनल सिटिजन पार्टी के रूप में संगठित हुए। फरवरी 2026 में हुए चुनाव के बाद बीएनपी के तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने। इसके बावजूद नेशनल सिटिजन पार्टी और जमात-ए-इस्लामी जैसे विपक्षी दल भारत के साथ संबंधों को लेकर सरकार पर लगातार सवाल उठा रहे हैं।
एनसीपी नेता नाहिद इस्लाम भारत पर बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में दखल देने के आरोप लगा चुके हैं। उन्होंने असम और पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के कथित उत्पीड़न और भारत-बांग्लादेश सीमा पर होने वाली हत्याओं जैसे मुद्दों को भी उठाया है।
हालांकि, इन आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत सामने नहीं रखे गए हैं। राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से देखें तो भारत विरोध कुछ विपक्षी नेताओं के लिए सरकार को घेरने और अपने समर्थकों को एकजुट करने का मुद्दा भी बन सकता है। घरेलू समस्याओं के बीच किसी बाहरी देश को निशाने पर लेने से राजनीतिक बहस का रुख बदलने की कोशिश की जा सकती है।
बांग्लादेश में भारत विरोधी नारेबाजी केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। इसका असर दोनों देशों के आपसी रिश्तों पर भी पड़ सकता है। भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार, सुरक्षा, ऊर्जा, जल बंटवारे और क्षेत्रीय संपर्क जैसे कई अहम मुद्दे जुड़े हुए हैं।
ऐसे में अगर घरेलू राजनीतिक विरोध लगातार भारत विरोधी अभियान का रूप लेता है, तो दोनों देशों के बीच सहयोग प्रभावित हो सकता है। खासकर गंगा जल समझौते, सीमा सुरक्षा और व्यापारिक संपर्क जैसे संवेदनशील मुद्दों पर तनाव बढ़ने की आशंका बनी रहती है।
बांग्लादेश के मौजूदा हालात में यह समझना जरूरी है कि वहां के विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत घरेलू समस्याओं से हुई है, लेकिन कुछ राजनीतिक समूहों की बयानबाजी ने भारत को भी इस बहस के केंद्र में ला दिया है। यही स्थिति दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से चिंता का विषय बन रही है।
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