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“खाकी पहनने से कोई कानून से ऊपर नहीं हो जाता” – दतिया कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, 4 पुलिसवालों पर FIR के आदेश

मध्य प्रदेश की दतिया मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पुलिसिया बर्बरता और सत्ता के दुरुपयोग पर सख्त रुख अपनाते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मर्यादा की सीमाएं लांघने वाले चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ आपराधिक मामला में FIR दर्ज करने का आदेश दिया है।
JMFC न्यायालय की न्यायाधीश विजयश्री पुंकर ने इस मामले पर फैसला सुनाया है। अदालत ने पीड़ित पक्ष के आवेदन को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कोतवाली पुलिस को …”अदालत ने साफ लफ्जों में कहा कि खाकी वर्दी पहनने का मतलब यह नहीं है कि कोई कानून से ऊपर हो गया है।

क्या है पूरा मामला?


यह मामला सिनावद थाना क्षेत्र का है। पीड़ित युवराज सिंह बुंदेला द्वारा कोर्ट में दायर याचिका के अनुसार, होली के दिन सिनावद थाने के SHO अरविंद भदौरिया, हेड कांस्टेबल पुष्पराज, कांस्टेबल कपिल शर्मा और महिला कांस्टेबल पूजा सिकरवार भारी पुलिस बल के साथ जबरन उनके घर में घुस आए। पुलिस टीम के पास न तो कोई सर्च वारंट था और न ही घर के अंदर बिना अनुमति आने का कोई कानूनी आदेश था।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि जब घर की महिलाओं जो उस वक्त नहा रही थीं, पुलिस के इस तरह जबरन दाखिल होने का विरोध किया, तो SHO अरविंद भदौरिया ने पीड़ित को सरेआम थप्पड़ मारा था।

वीडियो बनाने पर मां को लाठी से पीटा, छीने मोबाइल


यह घटनाक्रम तब और हिंसक हो गया जब पीड़ित की मां और बहन ने पुलिस की इस मनमानी को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करने की कोशिश की तो पुलिसकर्मियों ने न सिर्फ उनके मोबाइल फोन छीन लिए, बल्कि SHO ने पीड़ित की बुजुर्ग मां के सिर पर लाठी से जोरदार हमला भी किया। इस हमले में वो खून से लतपथ होकर मौके पर ही बेहोश हो गईं। इसके बाद पुलिस पीड़ित को जबरन गाड़ी में डालकर थाने ले गई और रास्ते में भी उसकी आंख पर मुक्के से वार किया गया, जिसकी कन्फर्मेशन बाद में मेडिकल रिपोर्ट में भी हुई।

मजिस्ट्रेट से सत्र न्यायालय तक पहुंची कानूनी जंग


पीड़ित ने इस अत्याचार के खिलाफ पहले पुलिस के आला अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन महकमे ने अपने ही साथियों को बचाने का प्रयास किया। इसके बाद पीड़ित ने कोर्ट की शरण ली। शुरुआत में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने इस आवेदन को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया था जिसके बाद पीड़ित ने हिम्मत न हारते हुए दतिया सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने मजिस्ट्रेट के पुराने फैसले को पलटते हुए आदेश दिया कि पीड़ित ने कानूनी प्रक्रिया का पूरा पालन किया है, इसलिए मामले की दोबारा मेरिट के आधार पर सुनवाई की जाएगी।

“यह ऑफिशियल ड्यूटी नहीं, गुंडागर्दी है”


सत्र न्यायालय के निर्देश पर दोबारा सुनवाई करते हुए दतिया मजिस्ट्रेट कोर्ट ने “CrPC की धारा (कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर) 156(3)” के तहत कोतवाली थाना प्रभारी को आरोपी चारों पुलिसकर्मियों के खिलाफ तुरंत FIR दर्ज कर जांच शुरू करने का आदेश दिया। मामले की सुनवाई करते हुए जज ने पुलिसिया कार्यप्रणाली पर बेहद तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा:

“बिना वारंट के किसी के घर में जबरन घुसना, महिलाओं और बच्चों के साथ मारपीट करना और उनके मोबाइल फोन छीन लेना किसी भी सूरत में ‘आधिकारिक ड्यूटी’ का हिस्सा नहीं माना जा सकता। यह सीधे तौर पर देश के संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए अनुच्छेद 21 “जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार” का सरेआम उल्लंघन है।”

इन धाराओं में दर्ज होगा मुकदमा


न्यायालय ने माना कि पहली नजर में आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ घर में जबरन घुसने (IPC Section 452) और मारपीट कर गंभीर चोट पहुंचाने (IPC Section 323) का अपराध बनता है। कानूनी जानकारों का मानना है कि कोर्ट के इस कड़े रुख से क्षेत्र के पुलिसकर्मियों में यह कड़ा संदेश जाएगा कि कानून की आड़ में की गई मनमानी को न्यायपालिका कभी बर्दाश्त नहीं करेगी।

news desk

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