ईरान पर हमले को लेकर अमेरिका अलग-थलग
वॉशिंगटन/लंदन: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक बड़ा कूटनीतिक मोड़ सामने आया है। ब्रिटेन ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका को ईरान पर संभावित हमलों के लिए अपने मिडिल ईस्ट सैन्य अड्डों का इस्तेमाल नहीं करने देगा। यह फैसला सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की रणनीति पर असर डाल सकता है।
ब्रिटिश सरकार ने हिंद महासागर स्थित Diego Garcia और ब्रिटेन के RAF Fairford जैसे अहम ठिकानों के उपयोग की अनुमति नहीं दी है। लंदन का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और चागोस द्वीपों से जुड़े विवाद के चलते इस तरह की सैन्य कार्रवाई में शामिल होना सही नहीं होगा। ब्रिटिश प्रधानमंत्री Keir Starmer पहले ही ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के बयान का विरोध कर चुके हैं, जिससे दोनों देशों के बीच तल्खी बढ़ी है।
जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ सैन्य मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है। ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर की गई टिप्पणी और यूरोपीय देशों पर 10–25% टैरिफ की धमकी ने माहौल और गरमा दिया। ब्रिटेन ने ग्रीनलैंड की संप्रभुता का समर्थन किया, जिसके बाद ट्रंप ने चागोस द्वीपों के समझौते से समर्थन वापस लेने का संकेत दिया। अब वही मुद्दा बेस उपयोग विवाद से जुड़ गया है।
इधर ट्रंप प्रशासन ने ईरान को 10–15 दिनों का अल्टीमेटम दिया है कि वह “सार्थक समझौता” करे, वरना “गंभीर परिणाम” भुगतने होंगे। जेनेवा में अप्रत्यक्ष बातचीत जरूर हुई, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने किसी बड़े ब्रेकथ्रू की उम्मीद कम जताई है।
अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है, जिसमें USS Gerald R. Ford कैरियर स्ट्राइक ग्रुप की तैनाती भी शामिल है। जवाब में ईरान ने रूस के साथ संयुक्त नौसैनिक अभ्यास किया है और अपनी परमाणु साइटों की सुरक्षा मजबूत की है। ट्रंप के कुछ सलाहकारों ने तो यहां तक कह दिया है कि आने वाले हफ्तों में सैन्य कार्रवाई की 90% संभावना है।
खाड़ी देशों ने भी ठुकराया था प्रस्ताव
बड़ी बात यह है कि सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं, बल्कि सऊदी अरब, यूएई, कतर और बहरीन जैसे खाड़ी देशों ने भी अमेरिका को अपने अड्डों के उपयोग की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। वे क्षेत्रीय युद्ध और तेल बाजार पर असर को लेकर चिंतित हैं। इजराइल जरूर अमेरिका के साथ खड़ा नजर आ रहा है, लेकिन यूरोप के कई देश हमले के खिलाफ हैं।
रूस और चीन भी ईरान के साथ सैन्य और आर्थिक सहयोग बढ़ा रहे हैं, जिससे समीकरण और जटिल हो गए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है – क्या ईरान के खिलाफ अमेरिका कूटनीतिक रूप से अकेला पड़ता जा रहा है?
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय हालात पर नजर रखे हुए है। अमेरिका कह रहा है कि वह शांति चाहता है, लेकिन ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना जरूरी है। वहीं ईरान ने अमेरिकी धमकियों को “सैन्य आक्रमण की तैयारी” बताते हुए संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की मांग की है। आने वाले कुछ हफ्ते तय करेंगे कि मामला बातचीत से सुलझेगा या मिडिल ईस्ट एक और बड़े टकराव की ओर बढ़ेगा।
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