सियासी

अमेरिका, भारत और पाकिस्तान: क्या ‘लॉबिंग फर्मों’ के जरिए चल रही है ‘विदेश नीति’?

अमेरिका से भारत के रिश्ते बीते कुछ दिनों से उतार चढ़ाव वाले रहे हैं. 90 के दशक से हमने अमेरिका को पाकिस्तान के होते हुए भी अपने लिए साध लिया था. फिर आज अचानक क्यों हमारे रास्ते पथरीले हो रहे हैं. आखिर अमेरिकी राष्ट्रपति के दफ्तर की भारत के प्रति जो बेरूखी है उसके कई कारण हो सकते हैं. लेकिन जो चौंकाने वाली बात सामने आ रही है वो एक नई कहानी बता रही है.

अमेरिका के जिस दफ्तर से नीतियां तय होती हैं, उसकी कहानी को समझने के लिए आपको इतिहास के चौखट पर ले चलते हैं. कहानी की शुरुआत 1845 से होती है, जब तीन ब्रिटिश जहाज़ अमेरिका का नया रास्ता खोजने के लिए आर्कटिक सर्कल की ओर निकले लेकिन बर्फ़ में फंस गए थे. नतीजा हुआ कि ठंड, भूख और स्कर्वी ने जहाज पर सवार सौ से ज़्यादा लोगों की जानें ले लीं लेकिन बर्फ में फंसे जहाज़ वहीं जमे रह गए. इसे एक हादसा समझकर भुला दिया गया.

दस साल बाद जब शिकारी वहां पहुंचे तो लावारिस हालत में वहां वहीं जहाज़ खड़े मिले. उन्हीं में से एक था ‘HMS Resolute’. अमेरिकियों ने उसे उठाया, दुरुस्त किया और ब्रिटेन को लौटा दिया. कुछ सालों बाद ‘HMS Resolute’ जहाज़ को तोड़ा गया और उसकी लकड़ी से बनी एक मेज़ तैयार हुई. जिसका नाम रखा गया ‘Resolute Desk’. रानी विक्टोरिया ने उसकी एक कॉपी रख ली और दूसरी उपहार स्वरूप अमेरिका भेज दी. जहां उस मेज को वॉशिंगटन के ओवल ऑफिस में रखा गया.

आज तक वही मेज़ वॉशिंगटन के ओवल ऑफिस में ही है, जिस पर केनेडी से लेकर रीगन, ओबामा और बाइडन तक बैठे. यानी हर अमेरिकी राष्ट्रपति उस मेज पर बैठा. यह डेस्क सिर्फ़ लकड़ी की मेज भर नहीं रही, यह दोस्ती, त्याग और शक्ति का प्रतीक बन गई. क्योंकि दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद अमेरिका और ब्रिटेन की दोस्ती समय के साथ गाढ़ी होती होती गई.

वही मेज आज दुनिया भर के देशों की विदेश नीति को कैसे प्रभावित कर रहा है, खासकर भारत और पाकिस्तान की विदेश नीति को ये अब समझना आसान होगा. आज उसी डेस्क पर हमारी कूटनीति की नई कहानी लिखी जा रही है. आम तौर पर किसी देश की विदेश नीति किस देश के साथ कैसी रहेगी ये सरकार, विदेश मंत्रालय, NSA और पूरी डिप्लोमैटिक कॉर्प्स मिल कर तय करते हैं. लेकिन अमेरिका के लिहाज से आज देखा जाए तो इसमें कुछ और घटक जुड़ गए हैं. जैसे लॉबिंग फर्म.

ये फर्म असल में बिचौलिये का काम करते हैं. जो भारी भरकम पैसे लेकर अमेरिकी की प्रभावशाली संस्थाओं जैसे कांग्रेस, सीनेट और पेंटागन तक पहुंच का रास्ता बनाते हैं. अप्रैल 2025 में भारत ने ट्रंप के भरोसेमंद प्रचार सलाहकार जेसन मिलर की फर्म SHW Partners LLC को $150,000 प्रति माह पर हायर किया था. इसके अलावा रिपब्लिकन झुकाव वाली Mercury Public Affairs को भी $225,000 दिए. रिपोर्ट्स के मुताबिक वॉशिंगटन की पुरानी ताक़तवर फर्म BGR Associates को तीन साल में भारत ने लगभग $600,000 दिए हैं. कुल मिलाकर सिर्फ 2025 में भारत ने लॉबिंग पर $2 मिलियन से ज़्यादा (₹17 करोड़) खर्च कर दिए—जितने में एक IIT कैंपस खड़ा किया जा सकता था.

दूसरी तरफ पाकिस्तान और भी आक्रामक खेल, खेल रहा है. 2025 में उसने वॉशिंगटन की टॉप फर्म Holland & Knight को $2.2 मिलियन रूपये दिए. Linden Government Solutions को $1.8 मिलियन और Brownstein Hyatt Farber Schreck को $600,000 से ज़्यादा. यानी सिर्फ़ 2025 में पाकिस्तान ने अमेरिका में लॉबिंग पर $4.7 मिलियन (₹39 करोड़) झोंक दिए. सीधी तुलना करें तो भारत के हर 1 डॉलर पर पाकिस्तान 3 डॉलर से ज़्यादा फेंक रहा है.

अब एक कल्पना करिए, ओवल ऑफिस का दरवाज़ा खुलता है. सामने वही Resolute Desk है. एक तरफ से भारत का दलाल जेसन मिलर दाखिल होता है, दूसरी तरफ पाकिस्तान का लॉबिस्ट Holland & Knight का आदमी. दोनों अपनी-अपनी फ़ाइलें राष्ट्रपति के सामने रखते हैं. एक कहता है—“भारत को सपोर्ट करो.” दूसरा कहता है—“पाकिस्तान को सपोर्ट करो.” और अमेरिकी राष्ट्रपति मन ही मन हंसता है कि “ये दोनों देश, मेरे दलालों की फीस भर रहे हैं.”

यह वही मेज़ है, जो कभी त्याग और दोस्ती का प्रतीक थी. लेकिन आज यह दलाली का मैदान बन गई है. भारत कहता है कि वह विश्वगुरु है, पाकिस्तान कहता है कि वह अमेरिका को अपने हक़ में मोड़ देगा. सच्चाई यह है कि दोनों करोड़ों रुपये वॉशिंगटन की गलियों में लॉबिइंग फर्मों पर लुटा रहे हैं. असल सवाल यह नहीं है कि किसने कितना खर्च किया. असल सवाल यह है कि क्या हम अपनी आवाज़ खुद उठाने की ताक़त खो चुके हैं? विश्व की सबसे बड़े बाजार पर आधारित हमारी कूटनीति अब लॉबिंग करने वाले फर्मों के भरोसे है ताकि हम अमेरिका से सहूलियत ले सकें.
ऐसे में सवाल है कि क्या हमें सहूलियत मिल भी रही है. अप्रवासी भारतीयों को हथकड़ी लगा कर भेजने से लेकर ऑपरेशन सिंदूर से होते हुए टैरिफ नीति तक हमें क्या सहूलियत मिली. पश्चिमी देशों में लॉबिंग फर्मों के जरिए काम निकलवाने की नीति कोई नई नहीं है. लेकिन पहले इसके जरिए बिजनेस को साधा जाता था. आज कल विदेश नीति भी निर्भर होने लगी है.

news desk

Recent Posts

इंडोनेशिया में 7.7 तीव्रता के भूकंप से तबाही, 51 की मौत; 341 आफ्टरशॉक्स से दहशत

इंडोनेशिया के पूर्वी हिस्से में शनिवार सुबह आए 7.7 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंप ने भारी…

2 hours ago

JPSC-JSSC Protest: भूख हड़ताल से देवेंद्र नाथ महतो की हालत बिगड़ी, डॉक्टर बोले- फ्लूइड बंद होते ही गिर रहा BP

रांची।झारखंड में JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार…

2 hours ago

वंदे मातरम विवाद पर अमित शाह का कांग्रेस पर हमला, सोनिया गांधी से मांगी माफी

Vande Mataram Row: स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कांग्रेस मुख्यालय में हुए कार्यक्रम के दौरान…

2 hours ago

LPG Supply: अब नहीं होगी रसोई गैस की किल्लत? सरकार ने बनाया बड़ा प्लान, 21 कंपनियों को मिला 63,810 टन का टारगेट

नई दिल्ली। देश में रसोई गैस यानी LPG की सप्लाई को अंतरराष्ट्रीय संकट से बचाने…

4 hours ago

BWF World Championships 2026: 17 साल बाद भारत में बैडमिंटन का महासंग्राम, जानें पूरा शेड्यूल और लाइव स्ट्रीमिंग

BWF World Championships 2026: बैडमिंटन की दुनिया का सबसे बड़ा टूर्नामेंट एक बार फिर भारत…

4 hours ago

Israel Election 2026: नेतन्याहू के सामने बड़ी चुनौती, गादी आइजेनकोट की पार्टी सर्वे में आगे; क्या बदल जाएगा सत्ता का समीकरण?

तेल अवीव। इजरायल में 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू…

5 hours ago