लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 16 अक्टूबर को होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर पिछले कई दिनों से चल रहा सियासी सस्पेंस अब खत्म हो गया है। समाजवादी पार्टी ने मंगलवार को तीसरा उम्मीदवार उतारने का फैसला बदल दिया। नामांकन की आखिरी तारीख पर लिए गए इस फैसले के बाद भाजपा के आठ और सपा के दो उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने का रास्ता साफ हो गया है।
तीसरे उम्मीदवार की तैयारी के बाद बदला फैसला
समाजवादी पार्टी ने कुछ दिन पहले राज्यसभा चुनाव में तीसरा उम्मीदवार उतारने के संकेत दिए थे। पार्टी के वरिष्ठ विधायक रविदास मेहरोत्रा ने भी एक दिन पहले कहा था कि तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारने की तैयारी पूरी हो चुकी है। इसके अगले ही दिन अखिलेश यादव ने अपना रुख बदल दिया।
अखिलेश यादव ने मंगलवार सुबह एक्स पर लिखा, “अब हमारी नजर तीन पर नहीं, 403 सीटों पर है।” उनके इस बयान से साफ हो गया कि पार्टी ने राज्यसभा चुनाव के बजाय फरवरी 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को अपनी प्राथमिकता बना लिया है।
सपा के इस फैसले के साथ राज्यसभा चुनाव में भाजपा और सपा के बीच संभावित मुकाबले की तस्वीर भी साफ हो गई। दोनों दलों के पास अपने मौजूदा विधायकों की संख्या के आधार पर क्रमशः सात और दो सीटें जीतने के लिए पर्याप्त संख्या है।
सपा का राज्यसभा चुनाव वाला गणित कितना कमजोर था?
समाजवादी पार्टी पहले ही राष्ट्रीय महासचिव राम गोपाल यादव और रिलायंस के अधिकारी धनराज नाथवानी को उम्मीदवार बना चुकी है। राम गोपाल यादव राज्यसभा में अपना छठा कार्यकाल चाहते हैं।
40 वर्षीय धनराज नाथवानी, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के कॉरपोरेट अफेयर्स डायरेक्टर परिमल नाथवानी के बेटे हैं। परिमल नाथवानी जून 2026 में झारखंड से एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा के लिए फिर चुने गए थे। यह उनका लगातार चौथा कार्यकाल है।
403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस समय 396 विधायक हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 37 पहली पसंद के वोट जरूरी हैं। सपा के पास 101 विधायक हैं, लेकिन उसकी प्रभावी संख्या 100 मानी जा रही है। चायल से सपा विधायक पूजा पाल भाजपा में शामिल हो चुकी हैं और फिलहाल भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष हैं।
कांग्रेस के दो विधायकों के समर्थन को जोड़ने पर सपा के पास 102 वोट होते हैं। ऐसे में तीसरे उम्मीदवार को जीत दिलाने के लिए पार्टी को जरूरी 37 वोटों के मुकाबले नौ अतिरिक्त पहली पसंद के वोट जुटाने पड़ते।
भाजपा ने आठवां उम्मीदवार उतारा तो सपा ने फिर सोचा
सपा से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, भाजपा के आठवां उम्मीदवार उतारने के फैसले के बाद पार्टी ने राज्यसभा चुनाव के पूरे गणित की दोबारा समीक्षा की। सूत्रों का दावा है कि भाजपा के कुछ विधायक सपा के संपर्क में थे, लेकिन विधानसभा चुनाव में कुछ ही महीने बाकी होने के कारण वे खुलकर बगावत करने से बच रहे थे।
यही स्थिति सपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई। पार्टी को अपने तीसरे उम्मीदवार को जिताने के लिए कम से कम नौ अतिरिक्त पहली पसंद के वोट चाहिए थे, जबकि भाजपा को अपने आठवें उम्मीदवार को जीताने के लिए केवल दो अतिरिक्त वोटों की जरूरत थी।
भाजपा के पास 294 वोट, आठवीं सीट के लिए सिर्फ दो की कमी
भाजपा के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में 255 विधायक हैं। उसके एनडीए सहयोगियों के पास 33 विधायक हैं। इनमें अपना दल (एस) के 13, राष्ट्रीय लोक दल के 9, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायक शामिल हैं।
इसके अलावा सपा से निकाले गए निर्दलीय विधायक मनोज पांडेय, राकेश प्रताप सिंह और अभय सिंह भी भाजपा के साथ हैं। इन तीनों को जून 2025 में 2024 के राज्यसभा चुनाव के दौरान क्रॉस-वोटिंग के बाद सपा से निष्कासित किया गया था।
राजा भैया की जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के दो विधायकों का समर्थन जोड़ने पर एनडीए की प्रभावी संख्या 294 हो जाती है। भाजपा के सभी आठ उम्मीदवारों को जीतने के लिए 296 पहली पसंद के वोट चाहिए। यानी पार्टी को सिर्फ दो अतिरिक्त वोटों की जरूरत है।
भाजपा ने सोमवार को अपने आठ उम्मीदवारों के नाम घोषित किए थे। पार्टी ने इस बार केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को उम्मीदवार नहीं बनाया। भाजपा के उम्मीदवारों में धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यसागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार शामिल हैं।
क्रॉस-वोटिंग का डर, 2027 के चुनाव ने बदली रणनीति
भाजपा को भरोसा है कि वह अपने आठवें उम्मीदवार के लिए जरूरी दो अतिरिक्त वोट जुटा लेगी। हालांकि एनडीए के कुछ विधायकों की ओर से क्रॉस-वोटिंग की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा रहा है।
अगर सपा तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारती तो 10 राज्यसभा सीटों के लिए 11 उम्मीदवार हो जाते और मतदान कराना पड़ता। सपा के एक नेता के मुताबिक, ऐसी स्थिति में क्रॉस-वोटिंग की संभावना बढ़ जाती और इसका फायदा भाजपा को अधिक मिल सकता था।
सपा नेता ने कहा कि सत्तारूढ़ खेमे की बदले की राजनीति को देखते हुए कई विधायक नाराज होने के बावजूद इस समय खुलकर सामने आने से डर रहे थे। पार्टी ने उनके फैसले का सम्मान करते हुए अब 2027 के बड़े लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया है।
वोटिंग की व्यवस्था भी सपा के लिए बनी मुश्किल
राज्यसभा चुनाव में आम चुनाव की तरह पूरी तरह गुप्त मतदान नहीं होता। विधायक अपना वोट पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाते हैं। ऐसे में सपा के नेताओं का मानना है कि जिन एनडीए विधायकों के पार्टी के संपर्क में होने का दावा किया जा रहा था, उनसे खुलकर क्रॉस-वोटिंग की उम्मीद करना आसान नहीं था।
2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक होने के कारण विधायक अपनी पार्टी के खिलाफ खुलकर जाने से बच सकते हैं। खास तौर पर तब, जब अगले विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया अभी शुरू भी नहीं हुई है।
यही वजह है कि राज्यसभा चुनाव में तीसरा उम्मीदवार उतारकर सपा के लिए मुकाबला खड़ा करना जोखिम भरा दांव साबित हो सकता था। पार्टी के सामने जहां अपने उम्मीदवार के लिए नौ अतिरिक्त वोट जुटाने की चुनौती थी, वहीं भाजपा को आठवीं सीट के लिए सिर्फ दो अतिरिक्त वोटों की जरूरत थी। ऐसे में अखिलेश यादव ने राज्यसभा के तत्काल मुकाबले के बजाय 2027 की 403 विधानसभा सीटों पर अपनी रणनीति केंद्रित करने का फैसला किया।