सीजेआई बीआर गवई के उपर जूता फेंकने की कोशिश मामले को लेकर देश में जाति आधारित भेदभाव पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है. केन्द्रीय मंत्री रामदास आठवले ने भी इस मामले को लेकर बड़ा बयान दिया है. उनका कहना है कि ‘यह सब इसलिए हुआ क्योंकि कुछ लोगों को यह बात हज़म नहीं हो रही कि दलित समाज से आने वाले एक न्यायमूर्ति इतने बड़े पद तक कैसे पहुंच गए’. रामदास अठावले के इस बयान ने कई सवाल खड़े कर दिया है.
सख्त कार्रवाई की मांग
केंद्र सरकार में मंत्री रामदास आठवले ने इस घटना की तीखी निंदा की है. दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि ‘यह कोई साधारण विरोध नहीं था, बल्कि न्यायमूर्ति गवई को निशाना बनाने के पीछे जातिगत मानसिकता काम कर रही है. गवई एक दलित समुदाय से आते हैं और उन्होंने इस ऊंचे पद तक अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर पहुंच बनाई है. लेकिन कुछ उच्च जाति से ताल्लुक रखने वाले लोग इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पा रहे’. आठवले ने यह भी मांग की, कि इस मामले में आरोपी पर एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया जाना चाहिए क्योंकि यह हमला केवल गवई की जाति के कारण किया गया.
CJI की प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के जज गवई ने खुद इस घटना को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने बताया कि घटना के वक्त वह और उनके साथ बैठे न्यायमूर्ति विनोद चंद्रन दोनों ही हैरान रह गए थे. उन्होंने कहा “सोमवार को जो कुछ हुआ, वह हमारे लिए चौंकाने वाला था, लेकिन अब हम उसे पीछे छोड़ चुके हैं”
6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई के दौरान एक 72 वर्षीय वकील राकेश किशोर ने अदालत में गवई की ओर जूता फेंकने की कोशिश की. हालांकि समय रहते सुरक्षा कर्मियों ने उसे रोक लिया. सीजेआई ने मामले को शांत करने की कोशिश करते हुए वकील को जाने देने की बात कही. बाद में दिल्ली पुलिस ने उस वकील से लंबी पूछताछ की और फिर छोड़ दिया. लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. बुधवार को बेंगलुरु में किशोर के खिलाफ एक और केस दर्ज किया गया. साथ ही सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने उसकी सदस्यता भी खत्म कर दी है और अब उसे सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं है. जूता फेंकने वाले आरोपी वकील ने सफाई दी है कि उसने यह कदम प्रधान न्यायाधीश द्वारा भगवान विष्णु की मूर्ति को लेकर की गई कथित टिप्पणी से आहत होकर उठाया. हालांकि इस पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से कोई औपचारिक बयान नहीं आया है.