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Indian Press House > Blog > विचार > लोकतंत्र या नियंत्रित व्यवस्था? रूस-चीन की राह पर चलती भारत और संघ की अदृश्य रणनीति!
विचार

लोकतंत्र या नियंत्रित व्यवस्था? रूस-चीन की राह पर चलती भारत और संघ की अदृश्य रणनीति!

news desk
Last updated: December 15, 2025 1:04 pm
news desk
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भाजपा-आरएसएस और सत्ता का केंद्रीकरण
भाजपा-आरएसएस और सत्ता का केंद्रीकरण
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एक समय देश में कांग्रेस पार्टी की तूती बोला करती थी। देश के हर कोने में कांग्रेस की सरकार हुआ करती थी। समय बदला, परिस्थितियाँ बदलीं और कांग्रेस कमजोर होती चली गई। इसी खाली होती राजनीतिक ज़मीन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजनीतिक मंच भारतीय जनता पार्टी ने 2014 में देश की शासन-सत्ता पर कब्ज़ा जमा लिया। इसके बाद धीरे-धीरे देश के हर राज्य और हर कोने में भाजपा और संघ की पकड़ मजबूत होती चली गई। यह मात्र संयोग नहीं था, बल्कि संघ की वर्षों पुरानी विचारधारा और रणनीतिक सोच का परिणाम था, जो 2014 से लेकर 2025 में मोदी शासन के तीसरे कार्यकाल तक साफ़ दिखाई देता है। यह केवल मोदी और शाह की सोच नहीं है, बल्कि इसके पीछे संघ की लंबी मेहनत और उसकी वैचारिक प्रयोगशाला का संगम है। यह सिर्फ सत्ता पर काबिज़ होने की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसी दूरगामी सोच है, जिसके परिणाम आज भले स्पष्ट न दिखें, लेकिन भविष्य की तस्वीर को आकार दे रहे हैं।

Contents
सत्ता के केंद्रीकरण की दीर्घकालिक योजनारूस: लोकतंत्र के नाम पर सत्तावादचीन का एक-दलीय राजनीतिक मॉडलभारत के लिए चेतावनी और भविष्य का खतरा

सत्ता के केंद्रीकरण की दीर्घकालिक योजना

यह प्रक्रिया केवल राज्यों पर राजनीतिक नियंत्रण तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सत्ता को पूरी तरह केंद्रित करने की एक बड़ी योजना छिपी हुई प्रतीत होती है। व्यक्तिगत और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बदलते स्वरूप भी इस ओर संकेत करते हैं कि कहीं भारत को भी किसी एक नेता और एक पार्टी के लंबे शासन के मॉडल की ओर तो नहीं ले जाया जा रहा। सवाल यह है कि क्या देश को धीरे-धीरे मुट्ठी में कैद करने की तैयारी हो रही है? इन तमाम सवालों का जवाब एक ही दिशा की ओर इशारा करता है—क्या भाजपा और संघ, चीन और रूस की तरह, एक पार्टी और एक नेता के इर्द-गिर्द देश को लंबे समय तक नियंत्रित करना चाहते हैं?

जैसे चीन में एक-दलीय शासन प्रणाली है और रूस में विपक्ष लगभग अप्रभावी कर दिया गया है, उसी तरह वहाँ पूरे देश का नियंत्रण एक पार्टी और एक नेता के हाथ में सिमट चुका है। आज की वैश्विक राजनीति में अगर किसी मॉडल को भारत के लिए मार्गदर्शक माना जा रहा है, तो वह रूस और चीन का मॉडल प्रतीत होता है, जिनके पदचिन्हों पर चलने का प्रयास भाजपा और संघ करते दिख रहे हैं।

रूस: लोकतंत्र के नाम पर सत्तावाद

रूस में औपचारिक रूप से लोकतांत्रिक प्रणाली मौजूद है, लेकिन व्यवहार में वह सत्तावादी शासन में तब्दील हो चुकी है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के हाथों में सत्ता पूरी तरह केंद्रित है। चुनावों पर सवाल उठते रहे हैं, मीडिया पर नियंत्रण है और नागरिक स्वतंत्रताएँ लगातार सीमित होती जा रही हैं। लोकतांत्रिक संस्थाएँ दिखती ज़रूर हैं—राष्ट्रपति, संसद और संविधान—लेकिन वास्तविक शक्ति राष्ट्रपति के इर्द-गिर्द ही घूमती है। विपक्ष कमजोर है और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लगभग खत्म हो चुकी है, जिससे रूस एक दोषपूर्ण लोकतंत्र का उदाहरण बन गया है।

चीन का एक-दलीय राजनीतिक मॉडल

इसी तरह चीन में पश्चिमी शैली का लोकतंत्र नहीं, बल्कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शासित एक-दलीय व्यवस्था है। इसे “समाजवादी लोकतंत्र” कहा जाता है, जहाँ जनता की भागीदारी के नाम पर परामर्श और चर्चाएँ होती हैं, लेकिन अंतिम निर्णय पार्टी के हाथ में ही रहता है। पार्टी स्थानीय स्तर पर चुनाव कराती है, पर स्वतंत्र उम्मीदवारों के लिए रास्ते लगभग बंद हैं। महासचिव ही राष्ट्रपति और सर्वोच्च नेता होता है, जैसे शी जिनपिंग। जनता की राय फोकस ग्रुप और परामर्श के ज़रिए ली जाती है, लेकिन सत्ता का केंद्र कभी भी पार्टी से बाहर नहीं जाता। चीन “जनवादी लोकतांत्रिक तानाशाही” की अवधारणा पर काम करता है, जहाँ व्यवस्था को चुनौती देने वाली किसी भी आवाज़ को सख्ती से दबा दिया जाता है।

भारत के लिए चेतावनी और भविष्य का खतरा

इन दोनों मॉडलों को देखकर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है – क्या आरएसएस और भाजपा भी भारत में ऐसा ही तंत्र स्थापित करना चाहती हैं? क्या मीडिया, संस्थाएँ और लोकतंत्र को धीरे-धीरे एक तानाशाही ढांचे में ढाला जा रहा है? विपक्ष को दबाने, राजनीतिक दलों को कमजोर करने और ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ जैसी योजनाओं के पीछे क्या एक-दलीय व्यवस्था की तैयारी छिपी है?

उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में चल रहा SIR और बिहार में हुआ प्रयोग इसी लोकतांत्रिक संकट की ओर इशारा करता है। संशोधित वोटर लिस्ट और एक समान चुनावी व्यवस्था के ज़रिए सत्ता को स्थायी बनाने की आशंका गहराती जा रही है। अगर समय रहते देश नहीं चेता, तो भविष्य में हालात रूस और चीन जैसे हो सकते हैं, जहाँ नागरिकों की आवाज़ दबा दी जाती है और राजनीतिक विकल्प समाप्त हो जाते हैं।

आज रास्ते खुले हैं, विकल्प मौजूद हैं, लेकिन अगर अभी गंभीरता से नहीं सोचा गया तो कल बहुत देर हो चुकी होगी। तब सिर्फ आह भरने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। देश जिस दिशा में बढ़ रहा है, वह लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी है, और अभी भी समय है कि इस पर गंभीर मंथन किया जाए।

शुएब नक़वी आग़ा की कलम से
शुएब नकवी आगा, राजनीतिक विश्लेषक

नोट – ये लेख और उसके विचार पूरी तरह लेखक के व्यक्तिगत हैं।

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TAGGED: Authoritarianism, BJP, China Model, Democracy in India, Future of India, Indian Democracy, Indian Politics, Indian Press House समाचार, Media Freedom, Narendra Modi, One Nation One Election, Opposition Politics, Political Strategy, Power Centralization, RSS, Russia Model
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