जयपुर: गणेशोत्सव के दौरान देशभर में भगवान गणेश के अलग-अलग मंदिरों में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन राजस्थान के जयपुर में अरावली की पहाड़ियों पर स्थित एक ऐसा मंदिर है, जहां गणपति का स्वरूप बेहद अनोखा है। यहां भगवान गणेश बाल रूप में विराजमान हैं और उनकी प्रतिमा में सूंड नहीं है। इसी खास स्वरूप और प्राचीन मान्यताओं के कारण गढ़ गणेश मंदिर जयपुर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है।
बाल रूप में बिना सूंड वाले गणेश
अरावली की पहाड़ियों की चोटी पर स्थित गढ़ गणेश मंदिर में भगवान गणेश की पुरुषाकृति यानी बाल स्वरूप में पूजा की जाती है। यहां स्थापित प्रतिमा में गणपति एक छोटे बच्चे के रूप में दिखाई देते हैं और उनकी सूंड नहीं है। गणेश जी का यह स्वरूप बेहद दुर्लभ माना जाता है।
यह मंदिर जयपुर के नाहरगढ़ और जयगढ़ किलों के आसपास की पहाड़ियों पर स्थित है। दूर से देखने पर पहाड़ी की चोटी पर बना मंदिर मुकुट जैसा दिखाई देता है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 365 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इन सीढ़ियों को साल के 365 दिनों का प्रतीक भी माना जाता है।
जयपुर बसने से पहले बनवाया गया था मंदिर
गढ़ गणेश मंदिर का इतिहास जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि 18वीं शताब्दी में जयपुर शहर की स्थापना से पहले ही महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था।
कहा जाता है कि जयपुर की नींव रखने से पहले महाराजा ने अश्वमेध यज्ञ कराया था। इसी यज्ञ के दौरान भगवान गणेश के बाल स्वरूप की स्थापना की गई। मान्यता यह भी है कि गणपति की पूजा-अर्चना के बाद ही जयपुर शहर की बसावट का काम आगे बढ़ाया गया।
चंद्र महल से दूरबीन के जरिए करते थे दर्शन
गढ़ गणेश मंदिर से जुड़ी सबसे दिलचस्प मान्यता महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय की गणेश भक्ति से संबंधित है। कहा जाता है कि उन्होंने मंदिर में गणेश जी की प्रतिमा की स्थापना इस तरह करवाई थी कि चंद्र महल से सीधे मंदिर के दर्शन किए जा सकें।
मान्यता के अनुसार महाराजा हर सुबह चंद्र महल से दूरबीन की मदद से गढ़ गणेश मंदिर में विराजमान गणपति के दर्शन करते थे। राजमहल और मंदिर के बीच यह सीधा संबंध इस धार्मिक स्थल को और खास बनाता है।
ऊंचाई से दिखता है गुलाबी शहर का नजारा
अरावली की पहाड़ी की चोटी पर होने के कारण गढ़ गणेश मंदिर से जयपुर शहर का विस्तृत और खूबसूरत दृश्य दिखाई देता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को सीढ़ियों का रास्ता तय करना पड़ता है, लेकिन ऊपर पहुंचने के बाद गुलाबी शहर का नजारा इस चढ़ाई को खास बना देता है।
पीढ़ियों से संभाल रहा है ‘औध्च्य’ परिवार जिम्मेदारी
बताया जाता है कि मंदिर की पूजा और प्रबंधन की जिम्मेदारी स्थापना के समय से ही ‘औध्च्य’ परिवार को सौंपी गई थी। परिवार आज भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। सामान्य दिनों में मंदिर में सुबह 7 बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम 4 बजे से रात 9 बजे तक दर्शन किए जा सकते हैं। विशेष अवसरों पर दर्शन के समय में बदलाव हो सकता है।