वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी ईरान नीति को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति से एक बेहद बड़ी खबर सामने आ रही है। अमेरिकी संसद के निचले सदन ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स’ (House of Representatives) ने राष्ट्रपति ट्रंप की ईरान युद्ध से जुड़ी सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाला एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पास कर दिया है।
इस वोटिंग की सबसे खास बात यह रही कि ट्रंप की अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के कई सांसदों ने बगावत की और पार्टी लाइन से हटकर विपक्ष (डेमोक्रेटिक पार्टी) के इस प्रस्ताव का खुला समर्थन किया। सदन में इस प्रस्ताव के पक्ष में 215 वोट पड़े, जबकि विरोध में केवल 208 वोट ही आ सके।
प्रस्ताव के पक्ष में रिपब्लिकन पार्टी के चार प्रमुख सांसदों— थॉमस मैसी, ब्रायन फिट्जपैट्रिक, टॉम बैरेट और वॉरेन डेविडसन ने मतदान किया। इन नेताओं ने अपनी ही सरकार को घेरते हुए जनता की चिंताओं को सामने रखा:
सांसद ब्रायन फिट्जपैट्रिक ने राष्ट्रपति ट्रंप पर देश के ऐतिहासिक कानून को नजरअंदाज करने का बेहद गंभीर आरोप लगाया है।
क्या है ‘वार पावर्स एक्ट’? इस अमेरिकी कानून के मुताबिक, देश के राष्ट्रपति किसी भी विदेशी सैन्य अभियान या युद्ध जैसे बड़े फैसलों को अपनी मर्जी से अनिश्चितकाल के लिए नहीं चला सकते। इसके लिए संसद (कांग्रेस) में खुली बहस और उसकी औपचारिक मंजूरी अनिवार्य होती है।
न्यूयॉर्क के डेमोक्रेट सांसद ग्रेगरी मीक्स, जिन्होंने इस प्रस्ताव को सदन में पेश किया था, उन्होंने कहा:
“संविधान के अनुसार सरकार और राष्ट्रपति की असीमित शक्तियों पर निगरानी रखना ही संसद का असली काम है।”
इस राजनीतिक ड्रामे के बीच अमेरिका की शीर्ष जांच एजेंसियों— पेंटागन (Pentagon), अमेरिकी विदेश मंत्रालय और USAID के इंस्पेक्टर जनरल ने इस पूरे ईरान युद्ध की आधिकारिक जांच शुरू कर दी है।
हालांकि, हाउस स्पीकर माइक जॉनसन इस प्रस्ताव के पूरी तरह खिलाफ नजर आए। उनका दावा है कि ईरान में अमेरिका के सभी सैन्य लक्ष्य पहले ही पूरे हो चुके हैं और ट्रंप प्रशासन अब एक शांति समझौते की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे में इस प्रस्ताव से कूटनीतिक प्रयास कमजोर हो सकते हैं।
प्रस्ताव का भविष्य: यह नया प्रस्ताव अब अंतिम मंजूरी के लिए ऊपरी सदन यानी सीनेट (Senate) के पास भेजा जाएगा। चूंकि यह एक प्रस्ताव (Resolution) है, इसलिए यह सीधे राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए नहीं जाएगा और न ही सीधे तौर पर पूर्ण कानून बनेगा। इसके बावजूद, इस कदम ने राष्ट्रपति ट्रंप पर भारी राजनीतिक, कूटनीतिक और कानूनी दबाव बना दिया है।
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