अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं और हमले की धमकी दे रहे हैं। ट्रंप चाहते हैं कि परमाणु समझौता जल्दी हो जाए, लेकिन अगर समझौता नहीं हुआ तो ईरान को बर्बाद करने की चेतावनी भी दे रहे हैं।
इस बीच, यदि संघर्ष शुरू होता है तो कौन-कौन से देश शामिल होंगे, इस पर कयासों का दौर जारी है। जहां चीन और रूस ईरान के साथ खड़े होने का दावा कर रहे हैं, वहीं ईरान की पूर्वी सीमा पर हलचल तेज है।
अफगानिस्तान ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। अफगान सरकार के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने रविवार को कहा कि अगर ईरान पर हमला होता है, तो अफगान लोग अपने ईरानी भाइयों को विभिन्न रूपों में समर्थन और एकजुटता देंगे।
वहीं पाकिस्तान ने अभी तक अपनी स्थिति साफ नहीं की है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान अमेरिका को नाराज नहीं करना चाहता और इसी कारण ईरान को लेकर चुप्पी साधे हुए है।
ईरान को तालिबान का खुला समर्थन, पाकिस्तान खामोश
अफगानिस्तान में तालिबान के साथ ईरान के रिश्ते और मजबूत होते दिख रहे हैं। अफगान सरकार के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि ईरान ने 12 दिनों की लड़ाई में जीत हासिल की है और खुद को किसी भी भविष्य के हमले से बचाने में सक्षम है।
पिछले हफ्ते अफगानिस्तान में ईरान के एम्बेसडर अलीरेजा बिकदेली ने कहा कि तेहरान कई क्षेत्रों में काबुल के साथ अपने संबंध मज़बूत करने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ईरान जल्द ही तालिबान सरकार को मान्यता दे सकता है। इससे पहले, रूस ने तालिबान सरकार को मान्यता दे दी है, जिससे ईरान का मजबूत अलायंस साफ दिखता है।
पाकिस्तान क्यों खामोश?
ईरान और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से अच्छे संबंध हैं और दोनों देशों के बीच लंबी सीमा साझा है। पाकिस्तान अक्सर मुस्लिम दुनिया के मुद्दों पर मुखर रहा है, लेकिन अमेरिका के सामने हाल के समय में आसिम मुनीर और शहबाज शरीफ सहित पाकिस्तान की राजनीतिक नेतृत्व चुप हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान को गाजा के लिए बनाए गए “बोर्ड ऑफ पीस” में अहम भूमिका दी है। साथ ही, पाकिस्तान अमेरिका के साथ विभिन्न डील और IMF जैसी संस्थाओं से मदद के लिए अमेरिका पर निर्भर है। यही कारण माना जा रहा है कि पाकिस्तान ईरान के साथ खुलकर समर्थन दिखाने से बच रहा है।
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