नई दिल्ली: नौकरी में तरक्की के लिए सिर्फ मेहनत करना ही काफी नहीं होता। कार्यस्थल पर आपका व्यवहार, फैसले लेने का तरीका और सहकर्मियों के साथ आपका रवैया भी करियर पर असर डालता है। आचार्य चाणक्य की नीतियों में जीवन के साथ-साथ कामकाजी परिस्थितियों को लेकर भी कई ऐसी बातें कही गई हैं, जिन्हें आज के दौर में भी उपयोगी माना जाता है।
अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि कुछ कर्मचारी लगातार मेहनत करने के बावजूद प्रमोशन या बड़ी जिम्मेदारियों से दूर रह जाते हैं। वहीं कुछ लोग अपनी कार्यशैली और व्यवहार के दम पर तेजी से आगे बढ़ते हैं। चाणक्य नीति के आधार पर ऐसी पांच आदतें बताई जाती हैं, जो कार्यस्थल पर आपकी छवि और करियर की राह दोनों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
हर किसी पर आंख बंद करके भरोसा करना
चाणक्य नीति में बिना सोचे-समझे किसी पर भरोसा करने से बचने की सलाह दी गई है। ऑफिस में यह सावधानी और भी जरूरी हो जाती है, क्योंकि हर सहकर्मी जरूरी नहीं कि आपका शुभचिंतक हो।
अगर आप अपनी निजी या काम से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें बिना सोचे किसी के साथ साझा करते हैं, तो इसका नुकसान आपको उठाना पड़ सकता है। कई बार दूसरे लोग आपकी जानकारी का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर सकते हैं या आपके काम का श्रेय भी ले सकते हैं।
ऐसे में कार्यस्थल पर लोगों के साथ अच्छे संबंध रखना जरूरी है, लेकिन भरोसा करने से पहले समझदारी बरतना भी उतना ही अहम है।
मेहनत करना, लेकिन अपने काम की जानकारी न देना
कुछ कर्मचारी पूरी लगन से काम करते हैं, लेकिन अपने योगदान को सामने रखने से बचते हैं। चाणक्य नीति के नजरिए से यह भी एक कमजोरी हो सकती है।
अगर बॉस को आपके काम और योगदान की सही जानकारी ही नहीं होगी, तो आपकी मेहनत की पहचान मुश्किल हो सकती है। ऐसी स्थिति में किसी दूसरे व्यक्ति को आपके काम का श्रेय मिलने की आशंका भी रहती है।
इसलिए अपनी उपलब्धियों का अनावश्यक प्रचार करने के बजाय सही समय पर अपने काम की प्रगति और योगदान की जानकारी वरिष्ठों तक पहुंचाना जरूरी है। करियर में आगे बढ़ने के लिए काम करने के साथ यह बताना भी जरूरी है कि आपने क्या हासिल किया है।
बात-बात पर बहस करना और जरूरत से ज्यादा बोलना
चाणक्य नीति में सोच-समझकर और सीमित बोलने को महत्व दिया गया है। कार्यस्थल पर हर छोटी बात पर बहस करना या बिना जरूरत अपनी राय रखने की आदत आपकी पेशेवर छवि को प्रभावित कर सकती है।
बॉस के सामने असहमति जताना गलत नहीं है, लेकिन अपनी बात रखने का तरीका महत्वपूर्ण होता है। लगातार बहस करने या बिना तथ्यों के प्रतिक्रिया देने से आपको गैर-जिम्मेदार समझा जा सकता है।
इसलिए अपनी बात स्पष्ट रखें, लेकिन भाषा और समय दोनों का ध्यान रखें। पेशेवर माहौल में संयमित संवाद कई बार ज्यादा प्रभावी साबित होता है।
भावनाओं में आकर फैसले लेना
कामकाज की दुनिया में कई फैसले ऐसे होते हैं, जिनमें भावनाओं के बजाय तथ्यों और व्यावहारिक सोच को प्राथमिकता देनी पड़ती है। चाणक्य की नीतियों में भी परिस्थितियों को समझकर निर्णय लेने पर जोर दिया गया है।
अगर कर्मचारी किसी काम से जुड़े फैसले व्यक्तिगत भावनाओं के आधार पर लेने लगे, तो गलत निर्णय की संभावना बढ़ सकती है। खासतौर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में ऐसी गलती का असर टीम और संगठन के काम पर भी पड़ सकता है।
इसी वजह से वरिष्ठ अधिकारी आमतौर पर उन कर्मचारियों पर ज्यादा भरोसा करते हैं, जो दबाव की स्थिति में भी शांत रहकर तर्क और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेते हैं।
आत्मविश्वास की कमी दिखाना और हर बात पर झिझकना
योग्यता होने के बावजूद अगर कोई कर्मचारी अपनी बात रखने में लगातार झिझकता है, तो उसकी क्षमता सामने नहीं आ पाती। कार्यस्थल पर आत्मविश्वास का मतलब दूसरों पर हावी होना नहीं, बल्कि अपनी बात को स्पष्ट और सम्मानजनक तरीके से रखने की क्षमता है।
अगर किसी कर्मचारी को जिम्मेदारी मिलने पर लगातार संदेह रहता है या वह अपने फैसले पर भरोसा नहीं दिखा पाता, तो उसे नेतृत्व की भूमिका के लिए तैयार मानना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए अपनी बात निडरता के साथ रखें, लेकिन अहंकार से बचें। अपनी योग्यता पर भरोसा रखते हुए जरूरत पड़ने पर सवाल पूछना और अपनी राय देना भी पेशेवर विकास का हिस्सा है।