नई दिल्ली: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस दौरान शिव मंदिरों में सबसे पहले श्रद्धालुओं की नजर शिवलिंग के सामने विराजमान नंदी महाराज पर पड़ती है। पूजा-अर्चना के बाद भक्त नंदी के कान में अपनी मनोकामना भी कहते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नंदी का जन्म कैसे हुआ और हर शिव मंदिर में उनकी प्रतिमा क्यों स्थापित की जाती है? शिव पुराण में इसका विस्तृत उल्लेख मिलता है। ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय के अनुसार, नंदी की जन्म कथा भगवान शिव की कृपा, तपस्या और अटूट भक्ति से जुड़ी हुई है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मचारी ऋषि शिलाद संतान प्राप्ति की इच्छा रखते थे। इसके लिए उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। कुछ समय बाद जब ऋषि शिलाद खेत जोत रहे थे, तब उन्हें भूमि से एक दिव्य बालक प्राप्त हुआ। उन्होंने उसी बालक को अपना पुत्र मानकर उसका नाम नंदी रखा।
कथा के अनुसार, कुछ संतों ने ऋषि शिलाद को बताया कि नंदी की आयु बहुत कम है। यह जानने के बाद नंदी भयभीत होने के बजाय भगवान शिव की कठिन तपस्या में लीन हो गए। उनकी अटूट श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और नंदी को बताया कि वे उनके ही अंश हैं, इसलिए उन्हें मृत्यु का कोई भय नहीं रहेगा।
ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय के अनुसार, जब भगवान शिव ने नंदी से वरदान मांगने को कहा तो उन्होंने केवल एक ही इच्छा व्यक्त की कि उन्हें जीवनभर भगवान शिव की सेवा करने का अवसर मिले। नंदी की इस निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपना वाहन और अपने प्रमुख गणों में स्थान दिया। तभी से प्रत्येक शिव मंदिर में शिवलिंग के सामने नंदी की प्रतिमा स्थापित की जाती है।
धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव अक्सर गहन ध्यान में लीन रहते हैं। ऐसे में श्रद्धालु अपनी मनोकामना नंदी के कान में कहते हैं। मान्यता के अनुसार, नंदी उचित समय पर भक्तों की प्रार्थना भगवान शिव तक पहुंचाते हैं। इसी कारण सावन के महीने में नंदी के कान में अपनी इच्छा बताने की परंपरा को विशेष रूप से शुभ और फलदायी माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन में भगवान शिव के साथ नंदी की पूजा भी विशेष फलदायी मानी जाती है। श्रद्धालु शिवलिंग के दर्शन से पहले नंदी को प्रणाम करते हैं और फिर अपनी मनोकामना उनके कान में कहते हैं। मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई प्रार्थना भगवान शिव तक अवश्य पहुंचती है।
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