वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बाद शांति समझौते पर सहमति बनने को वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। पिछले 100 दिनों से ज्यादा समय से बाजारों, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक कूटनीति पर मंडरा रही अनिश्चितता के बीच यह समझौता कई देशों के लिए उम्मीद लेकर आया है। अब सवाल यह है कि इस समझौते के बाद दुनिया पर क्या असर पड़ेगा, भारत को इससे कितना फायदा हो सकता है और हालात पूरी तरह सामान्य होने में कितना समय लग सकता है।
भू-राजनीतिक नजरिए से इस समझौते को हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जा रहा है। लंबे तनाव ने वैश्विक व्यापार, ऊर्जा बाजार और निवेश माहौल को प्रभावित किया था। अब उम्मीद जताई जा रही है कि हालात धीरे-धीरे स्थिर दिशा में बढ़ेंगे।
अमेरिका-ईरान तनाव के दौरान लाल सागर और फारस की खाड़ी जैसे अहम समुद्री व्यापारिक मार्गों पर जोखिम बढ़ गया था। इससे माल ढुलाई लागत और डिलीवरी समय दोनों प्रभावित हुए। समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय शिपिंग गतिविधियों में स्थिरता आने और लॉजिस्टिक्स लागत पर दबाव कम होने की संभावना जताई जा रही है।
ईरान दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में शामिल रहा है। लंबे समय से लागू प्रतिबंधों के कारण उसकी पूरी क्षमता वैश्विक बाजार तक नहीं पहुंच पा रही थी। यदि प्रतिबंधों में चरणबद्ध राहत मिलती है तो बाजार में आपूर्ति बढ़ सकती है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आने की उम्मीद बढ़ी है।
तनाव बढ़ने के दौरान निवेशकों में डर और सतर्कता बढ़ी हुई थी। युद्ध की आशंका से महंगाई और आर्थिक सुस्ती की चिंता भी गहराई थी। शांति समझौते के बाद निवेश भावना बेहतर होने और उद्योगों में निवेश गतिविधियां फिर तेज होने की उम्मीद की जा रही है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में स्थिरता भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कई स्तरों पर राहत ला सकती है।
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव कम होता है तो इसका असर भारत की आयात लागत पर पड़ सकता है। इससे परिवहन खर्च और कई जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर राहत की संभावना बन सकती है।
भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौरान विदेशी निवेशकों का रुख सतर्क बना हुआ था। स्थिर माहौल बनने पर निवेश भावना मजबूत हो सकती है और भारतीय बाजारों में पूंजी प्रवाह बेहतर होने की संभावना बढ़ सकती है।
तेल आयात बिल कम होने की स्थिति में डॉलर की मांग पर दबाव घट सकता है। इससे विदेशी मुद्रा संतुलन और रुपये की स्थिति को सहारा मिलने की संभावना जताई जा रही है।
शांति समझौते के बाद बाजारों की शुरुआती प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत तेजी से दिख सकती है। शेयर बाजार, मुद्रा और कमोडिटी बाजारों में एक से दो सप्ताह के भीतर राहत के संकेत दिखाई दे सकते हैं।
हालांकि समुद्री व्यापार मार्गों, बीमा लागत और ऊर्जा आपूर्ति तंत्र को पूरी तरह स्थिर होने में करीब 60 से 90 दिन तक का समय लग सकता है। वहीं बैंकिंग, वित्तीय और व्यापारिक प्रतिबंधों में संभावित बदलाव या राहत की प्रक्रियाएं कई मामलों में 3 से 6 महीने तक चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ सकती हैं।
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