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‘राइट टू डाई विद डिग्निटी’ पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी मुहर, 13 साल से PVS में रह रहे हरीश राणा के मामले में आया ऐतिहासिक फैसला

news desk
Last updated: March 11, 2026 12:52 pm
news desk
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अरुणा शानबाग से हरीश राणा तक
अरुणा शानबाग से हरीश राणा तक
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आज सुप्रीम कोर्ट ने 13 सालो से ‘वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) में रह रहे हरीश राणा को लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति देकर एक बार फिर भारत के कानूनी इतिहास में ‘राइट टू डाई विद डिग्निटी’ (गरिमा के साथ मरने का अधिकार) पर मुहर लगा दी है। यह फैसला हमें 15 साल पहले की उस कानूनी लड़ाई की याद दिलाता है, जिसने भारत में इच्छा मृत्यु की नींव रखी थी—अरुणा शानबाग केस।

भारत में यूथेनेशिया की बहस 2011 में अरुणा शानबाग के मामले से शुरू हुई थी। अरुणा, जो मुंबई के केईएम (KEM) अस्पताल में एक नर्स थीं, 1973 में एक अमानवीय हमले के बाद उनकी ज़िंदगी 42 सालों तक अस्पताल के बिस्तर तक ही सिमट कर रह गई।


2011 सुप्रीम कोर्ट ने तब अरुणा के लिए लाइफ सपोर्ट हटाने की याचिका तो खारिज कर दी थी, लेकिन पहली बार ‘पैसिव यूथेनेशिया’ को कानूनी मान्यता दी थी| लेकिन हरीश के मामले में कोर्ट ने कदम आगे बढ़ाते हुए उनके माता-पिता की पीड़ा को समझा और लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दे दी।

अदालत का फैसला
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने हरीश के माता-पिता की उम्र और उनकी असमर्थता को देखते हुए ये ऐतिहासिक आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी इंसान को मशीनों के सहारे केवल ‘सांस’ लेने के लिए छोड़ देना उसकी गरिमा का अपमान है।

हरीश को गाजियाबाद से दिल्ली के एम्स शिफ्ट किया जाएगा, जहाँ डॉक्टरों की एक स्पेशल टीम (Palliative Care) ये सुनिश्चित करेगी कि लाइफ सपोर्ट हटाते समय उन्हें कोई दर्द न हो।

जीने के अधिकार में है ‘गरिमापूर्ण मृत्यु’
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में क्लियर किया कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवित रहने की गारंटी नहीं देता, बल्कि सम्मान के साथ मरने का हक भी देता है। अरुणा शानबाग के समय जो कानूनी प्रक्रिया बेहद जटिल और ‘असंभव’ जैसी थी, हरीश राणा के केस ने उसे मानवीय और सुलभ बना दिया है।

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TAGGED: Article 21, Aruna Shanbag Case, Harish Rana case, IndianPressHouse, indianpresshouse news, Medical Ethics, Passive Euthanasia India, Right to Die with Dignity, Supreme Court verdict
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