फीचर

‘दिल्ली’ की चाहत में उजड़ गया अपना ही घर: ममता से केसीआर तक, ‘थर्ड फ्रंट’ के चक्कर में कैसे ढह गए क्षेत्रीय दिग्गजों के किले?

नई दिल्ली/कोलकाता। भारतीय राजनीति के कैनवास पर ‘तीसरा मोर्चा’ (Third Front) एक ऐसी मृगतृष्णा साबित हुआ है, जिसके पीछे भागते-भागते कई क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपनी जमीनी पकड़ खो दी। ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल से आ रहा है, जिसे कभी ममता बनर्जी का अभेद्य दुर्ग माना जाता था, लेकिन वहां बीजेपी ने 207 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया है।

ममता बनर्जी: ‘खेला होबे’ से अपनी जमीन खोने तक का सफर

2021 की प्रचंड जीत के बाद ममता बनर्जी ने खुद को पीएम मोदी के विकल्प के रूप में पेश करने के लिए ‘विस्तार नीति’ अपनाई। उन्होंने गोवा, त्रिपुरा और मेघालय में टीएमसी का झंडा बुलंद करने की कोशिश की, लेकिन इस ‘राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा’ की भारी कीमत उन्हें अपने ही राज्य में चुकानी पड़ी। टीएमसी जो कभी 200+ पर थी, आज 80 सीटों के नीचे सिमट गई है।

वो दिग्गज नेता जिनकी ‘राष्ट्रीय उड़ान’ ने उन्हें घर में गिराया

नेताराज्यमहत्वाकांक्षा का परिणाम
के. चंद्रशेखर राव (KCR)तेलंगानाTRS को BRS बनाया, राष्ट्रीय दौरे किए; 2023 में कांग्रेस से सत्ता हार गए।
चंद्रबाबू नायडूआंध्र प्रदेश2019 में विपक्षी एकता के सूत्रधार बने; राज्य में अपनी सत्ता और जमीन दोनों खो दी।
शरद पवारमहाराष्ट्रविपक्षी चेहरा बनने की कोशिश में पार्टी (NCP) दोफाड़ हुई; भतीजे ने पार्टी और सिंबल छीना।
अरविंद केजरीवालदिल्ली/पंजाबगुजरात और गोवा विस्तार के चक्कर में दिल्ली के किले में चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

केसीआर और नायडू की ‘हताश’ दौड़

तेलंगाना के 10 साल मुख्यमंत्री रहे केसीआर ने गैर-कांग्रेसी ‘थर्ड फ्रंट’ के लिए पटना से चेन्नई तक के चक्कर लगाए। उन्होंने अपनी पार्टी का नाम तक बदल दिया, लेकिन नतीजा यह रहा कि 2023 में कांग्रेस ने उन्हें उन्हीं के घर में पटखनी दे दी। यही हाल 2019 में चंद्रबाबू नायडू का हुआ था, जो बीजेपी से नाता तोड़कर विपक्षी एकता के ‘फेसिलिगेटर’ बनने निकले थे, लेकिन खुद अपनी सत्ता नहीं बचा पाए।

शरद पवार: राजनीति के ‘पितामह’ की उलझी बिसात

दशकों तक क्षेत्रीय दलों को एकजुट करने वाले शरद पवार की राजनीति का अंत काफी दर्दनाक रहा। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी चेहरा बनने की कोशिश के बीच उनकी अपनी ही पार्टी दो हिस्सों में बंट गई। आज वह अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव पर पार्टी के नाम और निशान को बचाने की कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

क्यों ‘गेम ओवर’ कर देता है थर्ड फ्रंट?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, तीसरे मोर्चे की असफलता के 3 मुख्य कारण हैं:

  1. पीएम पद की चाहत: कॉमन मिनिमम प्रोग्राम से ज्यादा नेताओं में पीएम बनने की होड़ रहती है। ममता, केजरीवाल और नीतीश एक-दूसरे का नेतृत्व स्वीकार नहीं करते।
  2. घरेलू मोर्चे पर लापरवाही: जब क्षेत्रीय नेता दिल्ली में ज्यादा समय बिताने लगते हैं, तो उनके अपने राज्य का कैडर और जनता उनसे दूर होने लगती है।
  3. मजबूत ध्रुवीकरण: 90 के दशक के विपरीत, आज बीजेपी एक बेहद अनुशासित और मजबूत कैडर वाली पार्टी है। राजनीति अब ‘त्रिकोणीय’ के बजाय दो ध्रुवों (NDA बनाम विपक्षी गठबंधन) की ओर बढ़ रही है।

तेलंगाना में केसीआर की हार, पवार की पार्टी का टूटना और बंगाल में ममता का कमजोर होना यह साबित करता है कि क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए ‘दिल्ली’ अभी बहुत दूर है। उनके लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के फेर में अपना घर दांव पर न लगाएं।

news desk

Recent Posts

प्रयागराज में ट्रिपल मर्डर से सनसनी, एक ही बेड पर मिले दो महिलाओं और एक पुरुष के खून से लथपथ शव

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में मंगलवार को दिल दहला देने वाली वारदात सामने आई।…

15 hours ago

यूपी में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, 13 आईएएस अधिकारियों के तबादले; गोरखपुर, बस्ती, बरेली और प्रयागराज को मिले नए मंडलायुक्त

लखनऊ: उत्तर प्रदेश सरकार ने मंगलवार को बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करते हुए 13 आईएएस अधिकारियों…

15 hours ago

यूपी में बारिश का नया अलर्ट, 3 दिन तक भारी बारिश की चेतावनी; कई जिलों में वज्रपात का भी खतरा

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में उमस भरी गर्मी से परेशान लोगों के लिए राहत की खबर…

15 hours ago

प्रशांत किशोर का बड़ा दावा, इन 3 वादों पर जीता बांकीपुर उपचुनाव, बोले- बिहार के लोगों को ‘जंगलराज’ की राजनीति मंजूर नहीं

पटना: बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जीत दर्ज करने के बाद जन सुराज प्रमुख प्रशांत किशोर…

15 hours ago

यूपी विधानसभा में भारी हंगामा: सीएम की तस्वीर लहराने पर भड़के स्पीकर सतीश महाना, बोले- सदस्यता रद्द कराने का प्रस्ताव भेज दूंगा

लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के दूसरे दिन सदन में जोरदार हंगामा देखने…

15 hours ago