सिनेमा की जंग में सत्ता से घायल एक एक्टर के सम्मान पर ठेस लगी तो उसने तय किया कि अब वो सत्ता ही बदल देगा। शुरू में लोगों को लोगों को मजाक लगा। लेकिन उस एक्टर ने एक ऐसी स्क्रिप्ट लिखी जिसने इतिहास बदल दिया।
पहली बार चुनाव लड़ना और सत्ता हासिल कर लेना। ये सिनेमा में तो होते हुए सबने देखा है, लेकिन असली राजनीति में ये करिश्मा एक सिनेमाई एक्टर ने कर दिखाया। तमिल सिनेमा के सुपरस्टार विजय थलपति ने तमिलनाडू के पॉलिटिक्स की पूरी एबीसीडी कैसे बदल दी। उसकी पूरी कहानी पढ़िए।
दरअसल विजय थलपति और डीएमके के बीच राजनीतिक जंग की शुरूआत बिजनेस, व्यक्तिगत इगो के चलते हुई थी। जो सिनेमा से लेकर सत्ता के संघर्ष तक पहुंची।
साल 2020 के आस पास की बात है। जब तमिल सिनेमा इंडस्ट्री में तमिलनाडू के पूर्व सीएम स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन की कंपनी Red Giant Movies तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर फिल्मों का डिस्ट्रीब्यूशन संभाल रही थी। ये माना जाता था कि बड़ी फिल्मों की रिलीज़ और स्क्रीन अलॉटमेंट पर उनका प्रभाव बढ़ गया है।
उस वक्त विजय थलपति तमिल सिनेमा के सुपरस्टार थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वो एक फिल्म के लिए 200 करोड़ या उससे ज्यादा की फीस लेते थे। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक जब कोई एक्टर इतनी फीस लेता है तो फिल्म का बजट बढ़ जाता है। इससे फिल्म की कमाई को लेकर रिस्क भी बढ़ जाता है।
यहीं पर दोनों के बीच मतभेद की खबरें भी आने शुरू हुईं। साल 2021 में विजय की फिल्म Master आई, इसके बाद 2022 में Beast और 2023 में Leo रीलिज हुईं। तीनों फिल्में सुपरहिट थी। लेकिन इसके साथ ही कहा जाता है कि उदयनिधि और विजय के बीच मतभेद भी बढ़ते गए।
एक तरफ दोनों का मतभेद बढ़ रहा था तो दूसरी तरफ तमिलनाडु की पॉलिटिक्स में भी बड़ा बदलाव आ रहा था। लंबें समय से वहां की सत्ता डीएमके और एआईडीएमके के बीच बंटती आ रही थी। लेकिन लोग अब बदलाव के मूड थे।
इसी के साथ विजय की फिल्मों में सामाजिक और राजनीतिक संदेश तेज़ होने लगे…उनके फैन्स ने उन्हें “पॉलिटिकल आइकन” की तरह देखना शुरू किया और कुछ सार्वजनिक बयानों व घटनाओं में सत्ता पक्ष की आलोचना जैसी धार दिखाई देने लगी। कहा जाता है कि डीएमके के कुछ हलकों में यह महसूस होने लगा कि एक सुपरस्टार का बढ़ता राजनीतिक प्रभाव भविष्य के समीकरण बदल सकता है। दूसरी तरफ विजय के समर्थकों का मानना था कि उन्हें “सिर्फ कलाकार” के दायरे में सीमित रखने की कोशिश हो रही है।
यही तनाव आगे चलकर एक बड़े मोड़ में बदल गया जहाँ विजय ने सिर्फ प्रतिक्रिया देने के बजाय खुद राजनीतिक दिशा तय करने का रास्ता चुना। उनके समर्थक इसे “सिस्टम के खिलाफ शांत लेकिन मजबूत विद्रोह” की तरह देखने लगे। धीरे-धीरे यही कहानी एक साधारण फिल्मी स्टार की नहीं रही, बल्कि एक ऐसे चेहरे की बन गई जिसने राजनीति को सीधे चुनौती देने का फैसला कर लिया। लेकिन ये राह आसान नहीं थी।
तो अब चलिए आपको बताते हैं कैसे विजय ने अपनी सियासी पारी की स्क्रिप्ट कैसी लिखी। विजय ने शुरुआत में खुद को सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि “जनता के मुद्दों से जुड़ा चेहरा” बनाया फिल्मों के जरिए सामाजिक संदेश दिया फैन क्लब्स को “सेवा नेटवर्क” में बदला….
उनकी रणनीति इसलिए भी और मजबूत रही क्यूंकि उन्होंने भ्रष्टाचार विरोध, युवा रोजगार सिस्टम में बदलाव पारंपरिक DMK-AIADMK राजनीति के खिलाफ “नई राजनीति” का नैरेटिव बनाया जिसने नए वोटर्स को और attract किया।
इसके साथ ही उन्होंने डिजिटल और फैन बेस पावर का भी इस्तेमाल किया तमिल सिनेमा के विशाल फैन नेटवर्क को माइक्रो-ऑर्गनाइज किया गया , सोशल मीडिया पर “विजय मूवमेंट” जैसी इमेज बनाई गई , छोटे-छोटे वीडियो, मीम्स और इमोशनल कैंपेन से माहौल बनाया गया और साथ ही ग्राउंड रैलिटी पर फोकस किया जैसे फैन क्लब्स को बूथ-लेवल नेटवर्क की तरह इस्तेमाल किया और साथ ही गठबंधन गणित उनके लिए किंगमेकर प्लान बना जैसे छोटे दलों से बातचीत की एंटी-इनकंबेंसी वोट को एकजुट किया और परिवर्तन बनाम पुरानी राजनीति” भी सन्देश दिया इसके अलावा सरकार के लूप होल्स को मुद्दा बनाना शुरू किया। विजय ने M. K. Stalin पर दलित फंड के “हेरफेर” के मुद्दे को भी जोर शोर से उठाया।
Vijay (actor) ने जनता के बीच यह संदेश मजबूत किया कि दलित और वंचित वर्गों के लिए आने वाला फंड सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हो रहा है या उस पर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने इस मुद्दे को अपने भाषणों और पब्लिक इमेज के जरिए बार-बार उठाया और इसे “न्याय और पारदर्शिता” की लड़ाई के रूप में पेश किया। इससे कुछ लोगों के बीच यह भावना बनी कि.. मौजूदा सत्ता के खिलाफ एक नया विकल्प जरूरी है।
आज की राजनीती में जहाँ हिन्दू मुस्लिम का कार्ड खेला जाता है वही विजय ने ये खुलकर कहा की वो मंदिर मस्जिद गिरजाघर सब जगह जाते हैं। 2026 के चुनाव में किसी बड़ी पार्टी ने ब्राह्मण जाति को एक भी टिकट नहीं दिया तो वहीं विजय ने ब्राह्मण उम्मीदवार भी उतारे।
दशकों से तमिलनाडू की सत्ता dmk और aidmk की duoploy के इर्द गिर्द घूम रही थी। लेकिन विजय थलपति ने अपने इमोशन और एक्शन से पूरी बाजी पलट दी। विजय ने तमिलनाडु की जनता को ये भरोसा दिलाया कि वो सबके हैं। यानी आम लोग, गरीब, पिछड़े, दलित, ब्राह्मण, हिंदू, मुस्लिम, इसाई सबके। वो जनता के मुद्दे की बात करते और जनता उन्हे अपनाती चली गई। इस तरह विजय तमिलनाडु की राजनीति में एक लहर बन कर आए और सब पर छाते चले गए। और बदल गई तमिलनाडु की सियासत।
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