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मानसून की दस्तक में फिर देरी, आखिर कब पहुंचेगा केरल? जानिए क्यों बार-बार बदल रही है IMD की तारीख

नई दिल्ली: देश के कई राज्यों में पिछले कुछ दिनों के दौरान हुई बारिश के बाद लोगों को उम्मीद थी कि दक्षिण-पश्चिम मानसून जल्द ही पूरे देश में सक्रिय हो जाएगा। हालांकि मौसम की मौजूदा स्थिति कुछ और ही संकेत दे रही है। इस वर्ष मानसून अपने निर्धारित समय से पीछे चल रहा है और अब तक केरल तट पर नहीं पहुंच सका है। मई महीने में भीषण गर्मी और उत्तर भारत में बने हीट डोम के कारण वातावरण में नमी बढ़ी, जिससे स्थानीय स्तर पर बादल बने और कई इलाकों में बारिश हुई। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यह बारिश मानसून की नहीं, बल्कि स्थानीय मौसमी परिस्थितियों का परिणाम है।

क्या होता है मानसून और कैसे करता है देश में प्रवेश?

दक्षिण-पश्चिम मानसून वह मौसमी प्रणाली है जिसके तहत अरब सागर से आने वाली नमी से भरी पश्चिमी हवाएं भारत के विभिन्न हिस्सों में व्यापक वर्षा कराती हैं। इसकी शुरुआत सामान्य तौर पर केरल से होती है और इसके बाद लगभग एक महीने के भीतर यह देश के अधिकांश हिस्सों तक पहुंच जाता है। मानसून का यह दौर करीब चार महीने तक जारी रहता है और कृषि सहित देश की अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

मानसून आने की घोषणा के लिए क्या हैं मौसम विभाग के मानक?

भारतीय मौसम विभाग किसी भी वर्ष मानसून के आगमन की घोषणा कुछ निर्धारित मानकों के आधार पर करता है। इसके लिए केरल के कम से कम 60 प्रतिशत मौसम केंद्रों पर लगातार बारिश दर्ज होना जरूरी है। इसके साथ ही अरब सागर के ऊपर पर्याप्त गति से पश्चिमी हवाओं का बहना और पर्याप्त बादलों की मौजूदगी भी आवश्यक शर्तों में शामिल है। फिलहाल केरल में बारिश और बादलों की स्थिति अनुकूल है, लेकिन पश्चिमी हवाओं की रफ्तार अपेक्षा से काफी कम बनी हुई है। यही कारण है कि मौसम विभाग अभी तक मानसून के आधिकारिक आगमन की घोषणा नहीं कर सका है।

तीन बार बदली गई मानसून आगमन की संभावित तारीख

मौसम विभाग ने प्रारंभिक अनुमान में मानसून के 26 मई तक केरल पहुंचने की संभावना जताई थी। बाद में यह अनुमान बदलकर 28 मई किया गया और फिर इसे एक जून तक बढ़ा दिया गया। अब विभाग का कहना है कि 3 जून से पहले मानसून केरल पहुंचने की संभावना नहीं है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहीं तो इसमें और देरी हो सकती है। हालांकि 8 जून तक केरल में मानसून का पहुंचना सामान्य दायरे में ही माना जाता है। इसके बाद जुलाई के पहले सप्ताह तक मानसून पूरे देश को कवर कर लेता है।

बंगाल की खाड़ी में सक्रिय चक्रवात बना नई चुनौती

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार बंगाल की खाड़ी में बने चक्रवाती तंत्र के कारण देश के पूर्वी हिस्सों में बारिश देखने को मिली है। इसके प्रभाव से उत्तर प्रदेश, राजस्थान समेत कई राज्यों में तेज हवाएं भी चली हैं। हालांकि यह प्रणाली मानसून को आगे बढ़ाने वाली पश्चिमी हवाओं को कमजोर कर रही है। इसके चलते मानसून की रफ्तार प्रभावित हुई है। मौसम विभाग ने पहले इस वर्ष सामान्य से 8 प्रतिशत कम यानी 92 प्रतिशत वर्षा का अनुमान जताया था, लेकिन अब संशोधित आकलन में वर्षा 90 प्रतिशत रहने की संभावना व्यक्त की गई है। विभाग का कहना है कि यदि पश्चिमी हवाओं की गति में तेजी आती है तो अगले दो से तीन दिनों के भीतर मानसून केरल पहुंच सकता है।

अल नीनो की आशंका बढ़ा रही मौसम विशेषज्ञों की चिंता

दुनिया भर की कई मौसम एजेंसियां और वैज्ञानिक इस वर्ष अल नीनो की स्थिति बनने की आशंका जता चुके हैं। अनुमान है कि सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है। अल नीनो वह स्थिति होती है जब प्रशांत महासागर का सतही जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसका असर भारत के मानसून पर भी पड़ता है और वर्षा में कमी देखी जाती है। विशेष रूप से अगस्त, सितंबर और नवंबर के दौरान बारिश सामान्य से कम हो सकती है। इसके अलावा सर्दियों में होने वाली मावठा वर्षा भी प्रभावित होती है।

खेती और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर

भारत की बड़ी आबादी कृषि आधारित आजीविका पर निर्भर है। देश के आधे से अधिक किसान आज भी मानसून की बारिश को खेती के लिए मुख्य जल स्रोत मानते हैं। ऐसे में मानसून का समय पर न पहुंचना और अल नीनो की संभावना का लगातार बढ़ना कृषि क्षेत्र के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय बनता जा रहा है। मौसम विभाग और किसान दोनों की नजरें अब आने वाले कुछ दिनों की मौसम गतिविधियों पर टिकी हुई हैं।

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