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‘फेविकोल का जोड़’ और ‘कुछ ख़ास है’ के जादूगर हुए ख़ामोश! मजदूर से एड लेजेंड तक का पीयूष पांडे ने कैसे पूरा किया सफर?

भारतीय विज्ञापन जगत के बेताज बादशाह, पद्म श्री पीयूष पांडे अब नहीं रहे. 70 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. इस खबर से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है. वह सिर्फ़ ओगिल्वी इंडिया (Ogilvy India) के कार्यकारी अध्यक्ष (Ex-Chairman) नहीं थे, बल्कि वह शख्स थे जिसने विज्ञापनों को एक अलग ‘पहचान’ दी, उन्हें हमारे जीवन का हिस्सा बना दिया. पीयूष पांडे को भारतीय विज्ञापन का ‘आर्किटेक्ट’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने 30-सेकंड के विज्ञापनों को भी छोटी, मज़ेदार कहानियों में बदल दिया करते थे.

पीयूष पांडे ने अपने चार दशक के करियर में जिन ब्रांड्स को आवाज़ दी, वे प्रोडक्ट से कहीं ज़्यादा बन गए. यहां उनके कुछ सबसे यादगार और आइकोनिक कैंपेन हैं, जिनका जादू आज भी क़ायम है. पीयूष पांडे ने अपनी रचनात्मकता से विज्ञापन जगत को नयी दिशा दी थी. उन्होंने फेविकोल को ग्रामीण हास्य और ‘फेविकोल का जोड़ है’ की कहानियों से जोड़ा, जबकि कैडबरी का ‘कुछ ख़ास है’ हर छोटे-बड़े जश्न का हिस्सा बन गया.  हच/वोडाफोन का ‘द पग’ अभियान कवरेज का इमोशनल साइन बना. वहीं, एशियन पेंट्स की टैगलाइन ‘हर ख़ुशी में रंग लाए’ और ‘ठंडा मतलब कोका-कोला’ ने ग्लोबल ब्रांड्स को देसी पहचान दी. इन सभी सफल अभियानों के कारण ही पीयूष पांडे भारतीय विज्ञापन के ‘ऐड गुरु’ कहा जाता था.

विज्ञापन जगत का ‘ग्रामर’ बदलने वाला शख़्स

पीयूष पांडे को उनके काम के लिए 2016 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था. विज्ञापन जगत के बड़े नाम उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कह रहे हैं कि उन्होंने न सिर्फ़ भारतीय विज्ञापन की भाषा बदली, बल्कि उसका ग्रामर भी बदल दिया.

एक क्रिकेट खिलाड़ी, चाय चखने वाले और निर्माण मजदूर के तौर पर करियर की शुरुआत करने वाले पीयूष पांडे ने अंतः में ओगिल्वी में अपनी असली मंज़िल पाई, जहां उन्होंने देश की विज्ञापन इंडस्ट्री को हमेशा के लिए बदल दिया. आज जब उनकी ख़बर आई है, तो हर कोई यही कह रहा है कि उनका हास्य, उनकी मूंछें और उनकी मनमोहक रचनात्मकता हमेशा यादों में रहेगी.

news desk

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