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Afghanistan-Pakistan तनाव के बीच फिर चर्चा में डूरंड लाइन, जानिए 133 साल पुरानी लकीर कैसे बनी टकराव की वजह

SYED MOHAMMAD ABBAS
Last updated: February 27, 2026 7:35 pm
SYED MOHAMMAD ABBAS
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अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच इस समय तनाव चरम पर बताया जा रहा है। सीमावर्ती इलाकों में दोनों ओर से गोलीबारी और हमलों की खबरें सामने आ रही हैं। इसी बीच 133 साल पुरानी डूरंड लाइन एक बार फिर विवाद के केंद्र में आ गई है।

डूरंड लाइन वह सीमा रेखा है, जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान को अलग करती है। इसे 1893 में ब्रिटिश शासन के दौरान निर्धारित किया गया था। हालांकि अफगानिस्तान ने ऐतिहासिक रूप से इस सीमा को औपचारिक अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है, जबकि पाकिस्तान इसे अपनी वैध सीमा मानता है। यही असहमति समय-समय पर दोनों देशों के बीच तनाव की बड़ी वजह बनती रही है।

ताजा घटनाक्रम में तालिबान बलों द्वारा पाकिस्तानी चौकियों पर हमले की खबर है। जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के कंधार और पक्तिया प्रांत में हवाई हमले किए। दोनों देशों ने एक-दूसरे को भारी नुकसान पहुंचाने का दावा किया है।

अफगान पक्ष का कहना है कि उसने दर्जनों पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और कई पोस्ट पर कब्जा किया, जबकि पाकिस्तान का दावा है कि उसने बड़ी संख्या में तालिबान लड़ाकों को ढेर किया है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि डूरंड लाइन पर नियंत्रण, सीमा पार गतिविधियां और सुरक्षा चिंताएं ही मौजूदा तनाव की मुख्य जड़ हैं। 133 साल पुरानी यह लकीर आज भी दोनों देशों के रिश्तों में अविश्वास और टकराव का प्रतीक बनी हुई है।

Durand Line पर एक नजर

इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि डूरंड लाइन का निर्धारण वर्ष 1893 में हुआ था। उस समय भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश शासन था और ब्रिटिश भारत की ओर से यह समझौता किया गया।1893 में ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन विदेश सचिव सर मोर्टिमर डूरंड काबुल पहुंचे और अफगानिस्तान के अमीर अब्दुर रहमान खान से वार्ता की। लंबी बातचीत के बाद 12 नवंबर 1893 को दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हुआ, जिसे डूरंड लाइन समझौता कहा जाता है।

इस समझौते के तहत अफगानिस्तान और ब्रिटिश भारत के बीच सीमा निर्धारण के लिए एक निश्चित रेखा तय की गई, जिसे नक्शे पर दर्शाया गया था। ब्रिटिश पक्ष ने आश्वासन दिया कि वह अफगान क्षेत्रों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, जबकि अफगान अमीर ने वादा किया कि वह ब्रिटिश शासित इलाकों में दखल नहीं देंगे।

करीब 2,640 किलोमीटर लंबी यह सीमा रेखा पश्चिम में ईरान की सीमा से शुरू होकर पूर्व में चीन की सीमा तक फैली हुई है। यही रेखा आगे चलकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा का आधार बनी।

अगर इसे सरल शब्दों में समझें तो डूरंड लाइन समझौता दरअसल ब्रिटेन और रूस के बीच चल रहे ‘ग्रेट गेम’ का हिस्सा था। उस दौर में मध्य एशिया में प्रभाव बढ़ाने को लेकर दोनों साम्राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा थी। ब्रिटेन नहीं चाहता था कि रूस अफगानिस्तान के रास्ते भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़े, इसलिए इस सीमा रेखा को एक तरह के बफर ज़ोन के रूप में देखा गया।

इस समझौते से अमीर अब्दुर रहमान खान को तत्कालीन समय में कुछ लाभ भी मिले। उनकी सालाना सब्सिडी बढ़ाई गई और उन्हें हथियार खरीदने की अनुमति दी गई, जिससे उनकी सत्ता मजबूत हुई।

हालांकि समय के साथ हालात बदल गए। अफगानिस्तान के भीतर कई लोगों ने इस रेखा को स्थायी अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि इस सीमा ने पश्तून जनजातियों को दो हिस्सों में बांट दिया—एक हिस्सा ब्रिटिश भारत (बाद में पाकिस्तान) में और दूसरा अफगानिस्तान में। यही विभाजन आज तक विवाद और तनाव की जड़ बना हुआ है।

क्यों आज भी खूनखराबा जारी है?

Durand Line के दोनों ओर बड़ी संख्या में पश्तून समुदाय के लोग रहते हैं। उनकी भाषा, संस्कृति और कबीलाई परंपराएं समान हैं, लेकिन सीमा पर लगी बाड़ और सुरक्षा कारणों से तनाव लगातार बना रहता है। हाल के वर्षों में प्रतिबंधित समूहों और सीमा-पार गतिविधियों को लेकर झड़पें बढ़ी हैं।

पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान की जमीन पर सक्रिय Tehrik-i-Taliban Pakistan (TTP) को शरण मिल रही है, जो पाकिस्तान में हमले करता है। वहीं अफगानिस्तान का कहना है कि पाकिस्तान अपनी सीमा की सुरक्षा ठीक से नहीं कर पा रहा और बिना वजह कार्रवाई करता है। इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच फरवरी 2026 में तनाव चरम पर पहुंच गया, जब पाकिस्तान ने कथित टीटीपी ठिकानों पर कार्रवाई की और अफगानिस्तान ने जवाबी कदम उठाए। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के पोस्ट और इलाकों पर नियंत्रण के दावे किए हैं।

पश्तून समुदाय की पीड़ा: एक परिवार, दो देश

सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि यह सीमा कई परिवारों और कबीलों को दो हिस्सों में बांट देती है। एक ही परिवार के सदस्य अलग-अलग देशों में रह रहे हैं। शादी-ब्याह, व्यापार और सामाजिक संबंध भी इस रेखा से प्रभावित होते हैं। पश्तून राष्ट्रवादी इसे ब्रिटिश काल की ‘डिवाइड एंड रूल’ नीति का परिणाम मानते हैं और आज भी कई लोग इस सीमा को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं करते।

पाकिस्तान ने 2017 से सीमा पर बाड़ लगाने की प्रक्रिया शुरू की है, जिसका अफगान पक्ष विरोध करता रहा है। यही ऐतिहासिक विवाद और मौजूदा सुरक्षा चिंताएं इस क्षेत्र में बार-बार तनाव और संघर्ष की वजह बनती हैं।

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