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महासागरों की बढ़ती गर्मी से बदल रहा पूरी दुनिया का मौसम! एल नीनो क्यों बना वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता, समझिए पूरी कहानी

नई दिल्ली: दुनिया के महासागर लगातार गर्म होते जा रहे हैं और वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर संकेतों में से एक मान रहे हैं। जून 2026 में महासागरों की सतह का औसत तापमान अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। विशेषज्ञों का कहना है कि नया एल नीनो विकसित हो रहा है, जिसका असर 2026 के साथ-साथ 2027 में भी दुनिया के मौसम पर देखने को मिल सकता है। इससे भीषण गर्मी, समुद्री हीटवेव, बाढ़, सूखा और शक्तिशाली चक्रवात जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।

150 साल में महासागरों का तापमान कितना बढ़ा?

वैज्ञानिकों के अनुसार, औद्योगीकरण से पहले वर्ष 1870 में उष्णकटिबंधीय और समशीतोष्ण महासागरों की सतह का औसत तापमान करीब 19.6 डिग्री सेल्सियस था। वर्तमान में यह बढ़कर लगभग 21 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि करीब 1.4 डिग्री सेल्सियस की यह वृद्धि मामूली नहीं, बल्कि पूरी पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर संकेत है।

महासागर लगातार गर्म क्यों हो रहे हैं?

विशेषज्ञों के मुताबिक, कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा लगातार बढ़ रही है। ये गैसें पृथ्वी की अतिरिक्त गर्मी को वातावरण में रोककर रखती हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस अतिरिक्त गर्मी का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा महासागरों ने अपने भीतर समाहित कर लिया है, जिससे उनका तापमान लगातार बढ़ रहा है।

वैज्ञानिकों ने क्यों जताई बड़ी चिंता?

विशेषज्ञों के अनुसार, वर्ष 2025 में महासागरों में जितनी अतिरिक्त ऊर्जा जमा हुई, वह प्रतिदिन हर सेकंड लगभग 12 हिरोशिमा परमाणु बमों से निकलने वाली ऊर्जा के बराबर थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस स्तर का तापमान परिवर्तन पहले हजारों वर्षों में होता था, वह अब मानव गतिविधियों के कारण महज करीब 100 वर्षों में देखने को मिल रहा है।

महासागर गर्म होने से क्या-क्या खतरे बढ़ेंगे?

महासागरों में बढ़ती गर्मी का असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता। इससे अधिक शक्तिशाली चक्रवात बन सकते हैं, हवा में नमी बढ़ सकती है, अचानक भारी बारिश और बाढ़ की घटनाएं बढ़ सकती हैं। इसके साथ ही भीषण हीटवेव, लंबे सूखे और मौसम के असामान्य बदलावों का खतरा भी बढ़ जाता है।

क्या है एल नीनो, जिससे पूरी दुनिया चिंतित है?

एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसका प्रभाव पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। इसके दौरान कई देशों में भीषण गर्मी, समुद्री हीटवेव, सूखा और शक्तिशाली चक्रवात देखने को मिल सकते हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।

2026 और 2027 क्यों हो सकते हैं ज्यादा गर्म?

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस समय विकसित हो रहा नया एल नीनो काफी प्रभावशाली हो सकता है। इसका सबसे अधिक असर उसके अंतिम चरण में दिखाई देता है। इसी वजह से 2026 के मुकाबले 2027 में और अधिक गर्मी पड़ने की आशंका जताई जा रही है, क्योंकि महासागरों में जमा अतिरिक्त गर्मी दोबारा सतह पर लौटती है।

दुनिया के किन इलाकों पर सबसे ज्यादा असर?

इस समय यूरोप रिकॉर्ड तोड़ गर्मी झेल रहा है। भूमध्य सागर के कुछ हिस्सों का तापमान सामान्य से 6 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया है, जबकि उत्तरी सागर के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से करीब 3 डिग्री सेल्सियस ज्यादा है। वहीं पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह और गहराई दोनों में असामान्य गर्मी दर्ज की जा रही है।

समुद्री जीवन पर भी मंडरा रहा बड़ा संकट

लगातार बढ़ते तापमान और समुद्री हीटवेव का सबसे ज्यादा असर प्रवाल भित्तियों, समुद्री घास और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, 2023-24 के एल नीनो के दौरान इन समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों को व्यापक नुकसान हुआ था और आने वाले वर्षों में खतरा और बढ़ सकता है।

जमीन पर कैसे पड़ता है महासागरों की गर्मी का असर?

विशेषज्ञों का कहना है कि महासागर में जमा गर्मी पूरी मौसम प्रणाली को प्रभावित करती है। इससे जमीन पर हीटवेव अधिक तीव्र हो सकती है, हवा में नमी बढ़ने से अचानक भारी बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा जंगलों में आग लगने की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं।

क्या पहले से की जा सकती है तैयारी?

वैज्ञानिकों के अनुसार, अब समुद्री हीटवेव और एल नीनो का कई महीने पहले तक अनुमान लगाया जा सकता है। इससे सरकारों को मछली पकड़ने की सीमा तय करने, समुद्री जीवों के संरक्षण की योजना बनाने और संभावित मौसमीय आपदाओं से निपटने की तैयारी करने का समय मिल जाता है।

मौसम का अनुमान लगाना क्यों हो सकता है मुश्किल?

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि महासागरों की निगरानी और जलवायु संबंधी आंकड़े जुटाने वाले कार्यक्रम कमजोर पड़ते हैं या उनकी फंडिंग कम होती है, तो भविष्य में मौसम और जलवायु का सटीक पूर्वानुमान लगाना और चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

 

vineet verma

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