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CBSE थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी, पूछा- किताबें कहाँ हैं! ‘क्या अंग्रेजी को भारतीय स्थानीय भाषा…?

news desk
Last updated: July 15, 2026 1:17 pm
news desk
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केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड “CBSE” की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश की शिक्षा व्यवस्था और बुनियादी ढांचे पर गहरे सवाल खड़े किए हैं। मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए माननीय न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण और नीतिगत सवाल पूछा:

Contents
कोर्ट ने ‘विदेशी भाषा’ के तर्क को व्यावहारिक हकीकत से परखा“22 विकल्प, पर वेबसाइट पर सिर्फ 3 भाषाएं”छात्रों के मानसिक तनाव और शिक्षकों की कमी पर चिंताकोर्ट का संदेश: भावनाओं से नहीं, व्यावहारिक संसाधनों से….अब आगे क्या

“क्या अब वह समय नहीं आ गया है कि अंग्रेजी को भी भारत की ही एक स्थानीय (लोकल) भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया जाए?” न्यायालय की इस टिप्पणी ने न केवल नई शिक्षा नीति (NEP) के क्रियान्वयन पर सवाल उठाए हैं, बल्कि देश के जमीनी हकीकत और कागजी दावों के बीच के अंतर को भी उजागर कर दिया है।

कोर्ट ने ‘विदेशी भाषा’ के तर्क को व्यावहारिक हकीकत से परखा

सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ताओं और वकीलों ने संविधान की 22 आधिकारिक भाषाओं को बढ़ावा देने और अंग्रेजी को एक ‘विदेशी भाषा’ के रूप में देखने की दलील दी, तो सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने बेहद व्यावहारिक और कड़े तर्क सामने रखे:

वैश्विक रोजगार और आजीविका का सवाल: कोर्ट ने टिप्पणी की कि आज के युवाओं का पूरा करियर, कॉर्पोरेट जगत और ग्लोबल जॉब मार्केट पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा पर निर्भर है। इस वास्तविकता की अनदेखी कर बच्चों के भविष्य से समझौता नहीं किया जा सकता।

न्यायालय ने ध्यान दिलाया कि भारत आज अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा अंग्रेजी बोलने वाला देश बन चुका है। यह भाषा अब केवल औपनिवेशिक विरासत नहीं, बल्कि भारतीय मध्यम वर्ग की प्रगति का मुख्य साधन है। कोर्ट ने कानूनी पक्ष रखते हुए कहा कि देश के पूर्वोत्तर राज्य जैसे नागालैंड और मेघालय अंग्रेजी को अपनी आधिकारिक राजभाषा घोषित कर चुके हैं। इसके अलावा, देश के सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की आधिकारिक भाषा भी अंग्रेजी ही है।

अदालत का रुख साफ था- “अंग्रेजी को पूरी तरह दरकिनार करना भारतीय छात्रों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेलने जैसा होगा”।

“22 विकल्प, पर वेबसाइट पर सिर्फ 3 भाषाएं”

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के बहुभाषी दावों की समीक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके इम्प्लीमेंटेशन की सबसे कमजोर कड़ी पर सीधा प्रहार किया। अदालत ने आधिकारिक आंकड़ों और संसाधनों की कमी पर उंगली उठाते हुए कहा:

“कागजों पर छात्रों को 22 क्षेत्रीय भाषाओं को चुनने का विकल्प दिया गया है, लेकिन NCERT की वेबसाइट पर आज भी केवल 3 भाषाओं (हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू) में ही पाठ्यसामग्री उपलब्ध है। जब पढ़ने के लिए किताबें और संसाधन ही उपलब्ध नहीं हैं, तो छात्र इसे कैसे सीखेंगे और शिक्षक क्या पढ़ाएंगे?”

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बिना किसी पूर्व तैयारी, इंफ्रास्ट्रक्चर और पाठ्यपुस्तकों के ऐसी नीतियां लागू करना सिर्फ कागजी खानापूर्ति है, जो छात्रों पर अतिरिक्त बोझ डालती है।

छात्रों के मानसिक तनाव और शिक्षकों की कमी पर चिंता

अदालत में इस बात पर भी चर्चा हुई कि कक्षा 6 से तीसरी भाषा को अनिवार्य करने से छात्रों और अभिभावकों पर क्या असर पड़ रहा है। कोर्ट के समक्ष आए तथ्यों के आधार पर दो मुख्य चिंताएं उभर कर आईं:

अकादमिक और मानसिक दबाव: पहले से ही भारी-भरकम सिलेबस का सामना कर रहे बच्चों पर बिना किसी बैकग्राउंड के एक नई और पूरी तरह से अपरिचित भाषा थोपना उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।

योग्य शिक्षकों का अभाव: देश के अधिकांश स्कूलों में तीसरी क्षेत्रीय भाषा को पढ़ाने के लिए योग्य और ट्रेंड टीचर्स के पद खाली पड़े हैं। कोर्ट के मुताबिक, ऐसी स्थिति में यह नीति सिर्फ एक ‘अकादमिक औपचारिकता’ बनकर रह जाएगी।

कोर्ट का संदेश: भावनाओं से नहीं, व्यावहारिक संसाधनों से….

सुप्रीम कोर्ट की इन तल्ख और व्यावहारिक टिप्पणियों ने साफ कर दिया है कि देश की शिक्षा नीतियां केवल भावनात्मक राष्ट्रवाद या कागजी योजनाओं पर आधारित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें भविष्य की व्यावहारिक जरूरतों और उपलब्ध संसाधनों के तराजू पर तौला जाना चाहिए।

अब आगे क्या

सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब गेंद शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई के पाले में है। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस सुनवाई के बाद बोर्ड को अपनी त्रि-भाषा नीति में ढील देने या संसाधनों को पहले दुरुस्त करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि बिना तैयारी के शुरू किया गया यह प्रयोग छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ साबित न हो।

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