अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का संज्ञान
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों को लेकर हाल ही में बदली गई परिभाषा से पैदा हुई चिंताओं पर खुद संज्ञान लिया है। पर्यावरण से जुड़े लोगों और विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव से अनियंत्रित खनन का रास्ता खुल सकता है, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान होने का खतरा है। अब इस पूरे मामले की सुनवाई 29 दिसंबर को होगी।
दरअसल, नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति की सिफारिशों को मानते हुए अरावली पहाड़ियों की एक नई और समान परिभाषा तय की थी। इसके मुताबिक, जिस भूमि की ऊंचाई स्थानीय राहत से 100 मीटर या उससे ज्यादा होगी, उसे अरावली पहाड़ी माना जाएगा। वहीं, 500 मीटर के दायरे में आने वाली दो या उससे ज्यादा ऐसी पहाड़ियां अरावली रेंज का हिस्सा होंगी।
परिभाषा बदलने पर क्यों उठा विरोध
इस फैसले के बाद पर्यावरण कार्यकर्ताओं, विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने कड़ा विरोध जताया। उनका कहना है कि ऊंचाई के आधार पर तय की गई इस परिभाषा से अरावली क्षेत्र का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सुरक्षा के दायरे से बाहर हो सकता है, क्योंकि ज्यादातर पहाड़ियां और झाड़ीदार वन 100 मीटर से कम ऊंचाई के हैं। इससे रेगिस्तान का फैलाव, भूजल स्तर में गिरावट, जैव विविधता को नुकसान और दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तरी भारत की जलवायु पर बुरा असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और आगे की राह
कोर्ट ने अपने नवंबर के फैसले में नए खनन पट्टों पर रोक लगाई थी और कहा था कि सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान बनने तक सिर्फ मौजूदा वैध खनन ही सख्त शर्तों के साथ चल सकता है। केंद्र सरकार का कहना है कि अरावली का 90 फीसदी से ज्यादा इलाका सुरक्षित रहेगा और अवैध खनन पर सख्त कार्रवाई होगी।
अब बढ़ते विरोध को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया है और इसे विशेष अवकाश पीठ के सामने सूचीबद्ध किया है, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत करेंगे। पर्यावरणविदों को उम्मीद है कि कोर्ट पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देगा। अरावली पहाड़ियां न सिर्फ देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में हैं, बल्कि उत्तरी भारत के पर्यावरण संतुलन के लिए भी बेहद अहम मानी जाती हैं।
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