मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को अंतरिम रूप से निलंबित करने की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। मामले की जड़ में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा अकेले लिए गए फैसले हैं। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) और फॉर्म 6 में बदलाव जैसे कम से कम 14 महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसले, अन्य दो चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी) की सहमति या जानकारी के बिना ही ले लिए गए। विपक्ष और याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इससे बहुसदस्यीय आयोग की सामूहिक निर्णय लेने की शक्ति का भारी दुरुपयोग हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान बेहद सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI), केंद्र सरकार और अन्य चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी कर 1 सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि जवाब से यह साबित हुआ कि नियम और सर्वसम्मति को दरकिनार कर एकतरफा फैसले लिए गए थे, तो अदालत उन फैसलों को पलटने में ज़रा भी संकोच नहीं करेगी।
30 राज्यों में 13 करोड़ वोटरों के नाम कटे?
यह पूरा विवाद तब गहराया जब द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में यह सनसनीखेज दावा किया गया कि SIR प्रक्रिया के दौरान देश के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने चुनाव का हवाला देते हुए अंतरिम निलंबन की मांग की थी, जिस पर कोर्ट ने कहा कि केवल मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर तुरंत बड़ा आदेश नहीं दिया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि यदि मनमानी साबित हुई, तो कानूनी शिकंजा कसना तय है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार के अंतरिम निलंबन की मांग पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है, लेकिन मामले को गंभीरता से लेते हुए ECI और केंद्र से जवाब तलब किया है। अब असली सवाल यही है कि क्या आयोग के फैसले नियमों और सामूहिक सहमति के तहत लिए गए थे? अगर सुनवाई में एकतरफा फैसलों के आरोप सही साबित होते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट इन फैसलों पर बड़ा हस्तक्षेप कर सकता है। यानी फिलहाल फैसला टला है, लेकिन सियासी और कानूनी घमासान अभी खत्म नहीं हुआ है।
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