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जब अमेरिका ने भारत को न्यूक्लियर पॉवर बनने से रोका था। जवाब में ‘बुद्ध मुस्कुराए’ और बदल गई दुनिया की परमाणु नीति!

18 मई, 1974। पोखरण। सुबह के साढ़े आठ बजे के आसपास, रेत के नीचे कुछ हुआ — जो ऊपर से देखने पर बस एक हल्का कंपन लग सकता था। लेकिन उस कंपन ने दुनिया के सबसे ताकतवर देशों की राजधानियों में हलचल मचा दी।

जिस परमाणु परीक्षण को लेकर आज अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर युद्ध थोपा है, कभी इसी तरह दुनिया भारत को परमाणु शक्ति बनने से रोक रही थी। लेकिन भारत कैसे सबकी आंखों में धूल झोंककर न्यूक्लियर पॉवर बना? ये कहानी बहुत कम लोग जानते हैं।

भारत ने परमाणु परीक्षण कर दिया था। और उसने इसे नाम दिया था — “स्माइलिंग बुद्धा”। यानी बुद्ध मुस्कुराए। लेकिन यह मुस्कान किसी की खुशी की नहीं थी। यह उस देश की मुस्कान थी जिसने दशकों की चुप्पी तोड़कर दुनिया को बताया — हम यहाँ हैं, और हम तैयार हैं।

“Yes, Go Ahead” — तीन शब्द जिन्होंने इतिहास बदल दिया
कहानी शुरू होती है दिल्ली के उस बंद कमरे से, जहाँ भारत के चुनिंदा परमाणु वैज्ञानिक और अफसर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने बैठे थे। माहौल गंभीर था। फैसला बड़ा था। दांव पर था भारत का वैश्विक रिश्ते, उसकी साख, और एक ऐसे कदम की जिम्मेदारी जिसे पलटा नहीं जा सकता था।
वैज्ञानिकों ने पूछा — क्या हम आगे बढ़ें?
इंदिरा गांधी ने कोई लंबा भाषण नहीं दिया। कोई दार्शनिक विचार नहीं रखा। बस तीन शब्द कहे, बेहद शांत आवाज में — “Yes, go ahead.”
और उन तीन शब्दों के साथ भारत का इतिहास बदल गया।

वो जख्म जो 1962 में मिला था

यह फैसला अचानक नहीं आया था। इसकी जड़ें थीं 1962 की भारत-चीन जंग में।
हिमालय की पहाड़ियों पर जो हुआ, वह सिर्फ एक धोखा नहीं था — वह भारत की आत्मा पर चोट थी। और तब, महज दो साल बाद, 1964 में चीन ने परमाणु परीक्षण कर दिया। जिससे एशिया में शक्ति का संतुलन अचानक बदल गया था।

उसी वक्त भारत के महान वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने एक बात कही जो आज भी उतनी ही सच लगती है — परमाणु हमले को रोकने का सबसे पक्का तरीका यह है कि सामने वाले को पता हो कि आप पलटवार कर सकते हैं। यही विचार आगे चलकर भारत की सुरक्षा सोच की बुनियाद बन गया। 1964 में संसद में इसे लेकर बहस भी हुई लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने परमाणु परीक्षण को कुछ समय के लिए रोक दिया था क्योंकि उस वक्त वो बहुत खर्चीला था।

1971 की जीत और एक गहरी तैयारी

1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध जीतने के बाद भारत का हौसला बुलंद था। बांग्लादेश आजाद हुआ था। इंदिरा गांधी की राजनीतिक ताकत अपने शिखर पर थी। और इसी आत्मविश्वास के बीच, परदे के पीछे, एक और काम चल रहा था। मुंबई के भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में वैज्ञानिक होमी सेठना और राजा रमन्ना की अगुआई में टीम लगी हुई थी। कोई शोरगुल नहीं। कोई बड़े-बड़े ऐलान नहीं। बस चुपचाप, धीरज के साथ, काम।
1972 तक वैज्ञानिकों ने सरकार को बताया — हम तैयार हैं।
अब सवाल था — कहाँ?
जवाब मिला — पोखरण। राजस्थान का वह सुनसान रेगिस्तान, जहाँ दूर-दूर तक कोई नहीं था। जहाँ रेत के नीचे एक राज दफन हो सके।

वह सुबह जब धरती हिली

18 मई, 1974।
धरती लगभग 4.9 की तीव्रता से कांपी। ऊपर रेत में एक उठान आई और फिर सब शांत हो गया। भारत ने दुनिया को बताया — यह एक “शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण” था। लेकिन वॉशिंगटन, लंदन और बीजिंग में कोई शांत नहीं था।
अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ बौखला गई थीं। इतने बड़े कार्यक्रम की भनक तक उन्हें नहीं लगी थी। यह सिर्फ एक परमाणु परीक्षण नहीं था — यह खुफिया तंत्र की सबसे बड़ी नाकामियों में से एक था। प्रतिबंध लगे। रिश्ते ठंडे पड़े। और इसी के जवाब में 1 साल बाद न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) का जन्म हुआ — एक ऐसा क्लब जो यह तय करता है कि परमाणु तकनीक किसे मिले और किसे नहीं।

बुद्ध की मुस्कान ने दुनिया की नीतियाँ बदल दी थीं।

1974 का सबसे बड़ा सबक यह नहीं था कि भारत ने बम बना लिया। सबसे बड़ा सबक यह था कि एक देश, अपनी सुरक्षा चिंताओं के आधार पर, दुनिया की परवाह किए बिना बड़े फैसले ले सकता है। चाहे दुनिया खुश हो या नाराज। हालांकि पश्चिमी मीडिया ने तब 1974 के परीक्षण पर संदेह जताए लेकिन ये भारत को न रोक पाने की उनकी खीज से ज्यादा नहीं था। सच ये था कि भारत न्यूक्लियर स्टेट बन चुका था।

Sandeep pandey

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