महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में यह चर्चा आम थी कि विधानसभा चुनावों से पहले सब कुछ शांत है, लेकिन पिछले 24 घंटों में पर्दे के पीछे जो खेल हुआ, उसने महाविकास अघाड़ी (MVA) के पैरों तले जमीन खिसका दी है।
इस ऑपरेशन की पहली झलक मंगलवार को तब मिली जब डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे मंत्रालय की कैबिनेट बैठक में पहुंचे। अमूमन मीडिया से हंसकर बात करने वाले शिंदे बेहद गंभीर थे, उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था और वह बिना कोई बयान दिए जल्दबाजी में मंत्रालय से बाहर निकल गए। सूत्रों की मानें तो शिंदे उस समय सीधे इस सीक्रेट ‘सांसद ऑपरेशन’ को मॉनिटर कर रहे थे।
इस बीच राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज रही कि एकनाथ शिंदे ने जयपुर जाकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की और उन्हें नए संसदीय गुट के गठन से जुड़ा पत्र सौंपने की जानकारी दी।
हालांकि, बाद में इस मुलाकात को खारिज कर दिया गया, लेकिन ठाकरे गुट के बागी सांसदों की दिल्ली में बढ़ती हलचल इस बात की गवाह है कि दिल्ली के पावर कॉरिडोर में स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है।
यह पूरा घटनाक्रम क्रोनोलॉजी के तहत हो रहा है। 19 जून (शुक्रवार) को शिवसेना अपने गठन के 60 साल पूरे कर रही है। शिंदे गुट की कोशिश है कि स्थापना दिवस के इस ऐतिहासिक मौके पर सातों सांसदों को एक मंच पर लाकर यह साबित कर दिया जाए कि ‘असली शिवसेना’ कौन है।
इसके ठीक दो दिन बाद यानी 21 जून को इन बागी सांसदों के औपचारिक रूप से शिंदे गुट में शामिल होने की संभावना है। इस वक्त ये सभी 7 बागी सांसद दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं और शिंदे के दिल्ली आवास पर उनकी हाई-लेवल मीटिंग होने जा रही है।
इस बगावत की स्क्रिप्ट 14 जून को ही ‘मातोश्री’ में लिख दी गई थी। जब उद्धव ठाकरे ने पार्टी सांसदों की बैठक बुलाई, तो 5 सांसद उसमें पहुंचे ही नहीं। इस पर उद्धव ठाकरे ने तल्ख तेवर दिखाते हुए कहा था, “जिन सांसदों को पार्टी छोड़कर जाना है, वो जा सकते हैं।” उद्धव के इसी बयान के बाद बागियों ने अपनी रफ्तार और तेज कर दी।
सियासी गणित: लोकसभा चुनाव में उद्धव गुट के कुल 9 सांसद जीते थे। अगर ये 7 सांसद पाला बदलते हैं, तो संसद में उद्धव ठाकरे के पास केवल 2 सांसद रह जाएंगे। दल-बदल कानून से बचने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है, और 9 में से 7 का आंकड़ा (लगभग 77%) शिंदे गुट को कानूनी रूप से भी बेहद मजबूत स्थिति में ला खड़ा करेगा।
इस पूरी बगावत का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस बार लड़ाई महाराष्ट्र विधानसभा की नहीं, बल्कि देश की संसद (Lok Sabha) की है।
लोकसभा चुनाव में महाविकास अघाड़ी के अच्छे प्रदर्शन के बाद उद्धव ठाकरे को उम्मीद थी कि उनका कैडर वापस लौट रहा है। लेकिन सांसदों का यह सामूहिक विद्रोह दिखाता है कि चुनाव जीतने के बाद भी सांसदों को उद्धव के नेतृत्व से ज्यादा एकनाथ शिंदे और केंद्र सरकार की नीतियों पर भरोसा है।
आगामी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यह ‘संसदीय सर्जिकल स्ट्राइक’ उद्धव ठाकरे के मोमेंटम को पूरी तरह बिगाड़ सकती है।
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