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शरीफ हादी की हत्या के बाद एनसीपी के एक और छात्र नेता पर जानलेवा हमला! क्या चुनावों से पहले अस्थिरता बढ़ाने की है साजिश?

बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। 2024 की छात्र क्रांति से निकले नेताओं पर हो रहे हमलों ने देश को गहरी अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। इंकलाब मंच के प्रवक्ता और छात्र आंदोलन के प्रमुख चेहरे शरीफ उस्मान बिन हादी की हत्या से उपजी हिंसा अभी थमी भी नहीं थी कि एक और गोलीबारी ने सियासी माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया। 22 दिसंबर 2025 को नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) के खुलना डिविजनल प्रमुख और केंद्रीय आयोजक मोतालेब सिकदार पर अज्ञात हमलावरों ने हमला किया। सिर में गोली लगने से वे गंभीर रूप से घायल हो गए और फिलहाल खुलना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उनका इलाज जारी है। यह घटना साफ संकेत देती है कि आगामी चुनावों से पहले राजनीतिक टकराव खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है।

शरीफ उस्मान बिन हादी की हत्या और भड़की हिंसा

शरीफ उस्मान बिन हादी 2024 की छात्र क्रांति के सबसे मुखर नेताओं में गिने जाते थे। वे शेख हसीना सरकार के खिलाफ हुए व्यापक आंदोलनों का चेहरा बने और इंकलाब मंच के प्रवक्ता के तौर पर लगातार सरकार पर हमलावर रहे। 12 दिसंबर 2025 को ढाका में अज्ञात हमलावरों ने उन्हें गोली मार दी। छह दिन तक अस्पताल में संघर्ष करने के बाद 18 दिसंबर को उनकी मौत हो गई। उनकी हत्या के बाद देशभर में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए। ढाका, चटगांव समेत कई शहरों में मीडिया हाउसों, राजनीतिक कार्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों को निशाना बनाया गया। हालात इतने बिगड़ गए कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख को भी शांति की अपील करनी पड़ी। इस हिंसा ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या बांग्लादेश की सुरक्षा व्यवस्था चुनावी दबाव झेल पाने में सक्षम है।

मोतालेब सिकदार पर हमला और एनसीपी की चुनौती

शरीफ की मौत के कुछ ही दिनों बाद मोतालेब सिकदार पर हुआ हमला इस बात का संकेत है कि यह हिंसा किसी एक घटना तक सीमित नहीं है। मोतालेब एनसीपी के खुलना डिविजनल चीफ हैं और पार्टी के केंद्रीय संगठन में उनकी अहम भूमिका है। एनसीपी 2025 में गठित एक नई, छात्र-प्रेरित पार्टी है, जिसने पारंपरिक दलों—अवामी लीग, बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी—की राजनीति को चुनौती दी है। विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव नजदीक आने के साथ ही एनसीपी को कमजोर करने की कोशिशें तेज हो गई हैं।

इन हमलों के बीच भारत-विरोधी भावनाओं और अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं, को निशाना बनाए जाने की खबरें भी सामने आ रही हैं, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर सरकार ने निष्पक्ष जांच और शांति बहाली के ठोस कदम नहीं उठाए, तो बांग्लादेश चुनावों से पहले एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक संकट में फंस सकता है।

news desk

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