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शाहरुख खान को बनाया ऐसा आशिक कि प्यार से ज्यादा उसके जुनून से डरने लगे लोग! यश चोपड़ा की वो फिल्म, जिसने बदल दी रोमांस की कहानी

नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा में जब भी रोमांस की बात होती है, यश चोपड़ा का नाम सबसे पहले याद आता है। उन्होंने पर्दे पर प्यार को सिर्फ खूबसूरत एहसास बनाकर नहीं दिखाया, बल्कि उसके जुनून, दर्द, इंतजार और दीवानगी को भी कहानियों का हिस्सा बनाया। उनकी फिल्मों ने रोमांस को एक अलग पहचान दी। लेकिन शाहरुख खान को एक ऐसे आशिक के रूप में पेश करना, जिसका प्यार धीरे-धीरे खतरनाक जुनून में बदल जाता है, यश चोपड़ा का ऐसा प्रयोग था जिसने दर्शकों को चौंका दिया। फिल्म थी ‘डर’, जिसने शाहरुख के करियर को नई पहचान देने में अहम भूमिका निभाई।

जब प्यार करने वाला ही बन गया खौफ की वजह

1993 में रिलीज हुई ‘डर’ में शाहरुख खान ने राहुल मेहरा का किरदार निभाया था। राहुल किरण यानी जूही चावला से प्यार करता है, लेकिन उसका प्यार धीरे-धीरे जुनून की शक्ल ले लेता है। किरण को पाने की चाह में वह उसका पीछा करता है और उसे परेशान करता है। फिल्म में सनी देओल ने भी अहम भूमिका निभाई थी।

उस दौर में शाहरुख को इस तरह के नकारात्मक किरदार में पेश करना एक बड़ा प्रयोग था। यश चोपड़ा ने राहुल के जरिए दिखाया कि प्यार और किसी पर अपना अधिकार जमाने की जिद के बीच कितना बड़ा फर्क हो सकता है। शाहरुख की अदाकारी ने इस किरदार को यादगार बना दिया और उन्हें एक अलग तरह की पहचान दिलाई।

‘धूल का फूल’ से शुरू हुआ था फिल्मों का सफर

यश चोपड़ा का जन्म 27 सितंबर 1932 को लाहौर में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनका पूरा नाम यश राज चोपड़ा था। फिल्मों के प्रति लगाव उन्हें इस दुनिया में खींच लाया। उन्होंने अपने बड़े भाई बी.आर. चोपड़ा के साथ काम करते हुए फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखीं और शुरुआत में सहायक के तौर पर अनुभव हासिल किया।

1959 में आई ‘धूल का फूल’ से उन्होंने निर्देशन के क्षेत्र में अपनी पहचान बनानी शुरू की। इसके बाद ‘धर्मपुत्र’ और ‘वक्त’ जैसी फिल्मों ने उन्हें एक गंभीर और प्रतिभाशाली निर्देशक के रूप में स्थापित किया। 1965 में रिलीज हुई ‘वक्त’ में कई बड़े कलाकार एक साथ नजर आए और फिल्म को काफी सराहना मिली। ‘इत्तेफाक’ और ‘आदमी और इंसान’ जैसी फिल्मों ने भी उनके निर्देशन की विविधता को सामने रखा।

अमिताभ बच्चन के करियर में भी निभाई अहम भूमिका

यश चोपड़ा की खासियत यह थी कि वह अलग-अलग तरह की कहानियों और किरदारों के साथ प्रयोग करने से पीछे नहीं हटते थे। 1973 में उन्होंने यश राज फिल्म्स की स्थापना की और इसी साल ‘दाग’ के जरिए अपने नए सफर को आगे बढ़ाया।

इसके बाद ‘दीवार’, ‘कभी-कभी’, ‘त्रिशूल’ और ‘काला पत्थर’ जैसी फिल्मों ने उनकी पहचान और मजबूत की। ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन का किरदार उस दौर के गुस्से, संघर्ष और व्यवस्था से टकराते युवा की छवि के तौर पर उभरा। इस फिल्म ने अमिताभ की एंग्री यंग मैन वाली पहचान को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।

रोमांस को दिया नया अंदाज, हर कहानी का रंग रखा अलग

यश चोपड़ा की फिल्मों में प्यार की एक ही तस्वीर नहीं दिखाई देती थी। कहीं रिश्तों के बीच उलझनें थीं, कहीं अधूरी मोहब्बत का दर्द और कहीं समाज तथा सरहदों से परे रिश्तों की कहानी। ‘डर’ के बाद उन्होंने ‘दिल तो पागल है’, ‘वीर-जारा’ और ‘जब तक है जान’ जैसी फिल्मों में रोमांस के अलग-अलग रंग पेश किए।

उनकी फिल्मों की खासियत सिर्फ प्रेम कहानियां नहीं थीं, बल्कि उन्हें पर्दे पर पेश करने का अंदाज भी था। खूबसूरत दृश्य, संगीत, भावनात्मक टकराव और याद रह जाने वाले किरदार उनकी फिल्मों की पहचान बने। यही वजह रही कि उन्हें हिंदी सिनेमा का ‘किंग ऑफ रोमांस’ कहा गया।

‘डर’ को भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय मनोरंजक फिल्म का सम्मान मिला। इस फिल्म ने शाहरुख खान की पर्दे पर बनी उस छवि को भी मजबूत किया, जिसमें वह केवल पारंपरिक नायक नहीं, बल्कि जटिल और चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने वाले अभिनेता के रूप में सामने आए।

‘जब तक है जान’ बनी आखिरी निर्देशित फिल्म

हिंदी सिनेमा में योगदान के लिए यश चोपड़ा को कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें 2001 के लिए दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और 2005 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

अपने 80वें जन्मदिन पर 2012 में उन्होंने घोषणा की थी कि ‘जब तक है जान’ उनके निर्देशन की आखिरी फिल्म होगी। इसमें शाहरुख खान, कटरीना कैफ और अनुष्का शर्मा मुख्य भूमिकाओं में थे। 21 अक्टूबर 2012 को यश चोपड़ा का निधन हो गया। उनकी आखिरी निर्देशित फिल्म 13 नवंबर 2012 को रिलीज हुई।

यश चोपड़ा भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्मों के किरदार और उनकी कहानियों में दिखाया गया प्यार आज भी हिंदी सिनेमा की यादगार विरासत का हिस्सा हैं।

vineet verma

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