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NDA में सीट शेयरिंग पर फंसा पेंच, टालना पड़ा उम्मीदवारों के नाम का ऐलान! मांझी, कुशवाहा के बाद जेडीयू ने भी दिखाई नाराजगी?

क्या एनडीए में सीट शेयरिंग की घोषणा होने के बाद भी सहमति नहीं बन पाई है. ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि आज शाम एनडीए के उम्मीदवारों के नामों का ऐलान होना था लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस टाल दी गई. इतना ही नहीं बल्कि सूत्रों के हवाले से खबर है कि उम्मीदवारों पर सहमति बनने से पहले ही जेडीयू ने अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान करने से पहले ही सिंबल बांटना शुरू कर दिया. जिसको लेकर एनडीए में मतभेद तेज हो गए हैं.

रविवार को सीट शेयरिंग की घोषणा के बाद जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा ने बीजेपी के साथ बने रहने की बात तो कही लेकिन कम सीटे मिलने का दर्द भी छिपा नहीं पाएं. कहा जा रहा है कि सीट बंटवारे को लेकर अंदर ही अंदर जो मतभेद उबल रहे थे, अब वे सतह पर आने लगे हैं. यही कारण है कि आज की महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस टालनी पड़ी.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीजेपी और जेडीयू ने 101-101 सीटों के बराबरी के बंटवारे के बाद सहयोगी दलों को दी जाने वाली सीटों का ऐलान करने की तैयारी की थी. इसी सिलसिले में आज शाम जेडीयू कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस करना तय किया गया था. लेकिन ऐन वक्त पर जेडीयू ने ट्वीट डिलीट कर दिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस को टाल दिया. सूत्रों के अनुसार, मांझी और कुशवाहा दोनों ही अपने लिए कम सीटें मिलने पर नाराज़ थे और उन्होंने इसे सार्वजनिक मंच पर उठाने की चेतावनी दी थी.

‘बड़े भाई’ की भूमिका छिनने से जेडीयू नाराज?

इस पूरे मामले में एक बड़ा राजनीतिक संकेत भी छुपा है. नीतीश कुमार अब एनडीए में ‘बड़े भाई’ नहीं रहे. बीजेपी और जेडीयू दोनों को बराबर सीटें मिलना दर्शाता है कि अब नीतीश की हैसियत गठबंधन में बराबरी की हो गई है. इसके अलावा दिनारा समेत कई सीटें जो जेडीयू अपने कोटे में चाहती थी वो नहीं मिलने से जेडीयू भी नाराज बताई जा रही है. ये वही नीतीश हैं जिनके बिना बिहार में एनडीए की राजनीति अधूरी मानी जाती थी. लेकिन अब जब छोटे दल उनके फैसलों से नाखुश हैं, तो यह सवाल उठने लगा है कि क्या नीतीश अब पहले नेता नहीं रहे?

चुनाव पर पड़ेगा असर?

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अगर मांझी और कुशवाहा नाराज़ ही रहे, तो वे न केवल प्रचार से दूर रह सकते हैं, बल्कि उनके समर्थक वोटरों में भी असंतोष पैदा हो सकता है. इससे कई सीटों पर NDA की स्थिति कमजोर हो सकती है, खासकर दलित और पिछड़े वर्गों वाले क्षेत्रों में.

news desk

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