मोहम्मद सिराज टी-20 विश्व कप टीम के शुरुआती हिस्से में शामिल नहीं थे, लेकिन अचानक उनकी टीम में एंट्री हो गई। दरअसल, बीते कुछ हफ्तों से सिराज क्रिकेट से दूर थे। उन्होंने ब्रेक लेकर मैड्रिड में रियल मैड्रिड बनाम रियल सोसिदाद का मुकाबला देखने की योजना बनाई थी। इसके बाद रमज़ान के दौरान वह अपने परिवार के साथ वक्त बिताना चाहते थे, इसलिए फिलहाल क्रिकेट से दूरी बना ली थी।
हालांकि परिस्थितियां तब बदलीं, जब तेज़ गेंदबाज़ हर्षित राणा चोटिल हो गए। इसके बाद किस्मत ने एक बार फिर सिराज के दरवाज़े पर दस्तक दी और अचानक उनकी टीम में एंट्री हो गई। इसके लिए खुद भारतीय टीम के कप्तान सूर्यकुमार यादव ने सिराज को फोन कर टीम से जुड़ने को कहा।
सिराज को शुरुआत में लगा कि शायद उनके साथ मज़ाक किया जा रहा है। उन्होंने हंसते हुए कहा भी, “मजाक मत करो।” लेकिन यह मजाक नहीं था। देखते ही देखते सिराज एक बार फिर भारतीय जर्सी में नज़र आए और टी-20 विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में खेलने उतर गए-एक ऐसा टूर्नामेंट, जिसे लेकर वह खुद को पहले ही बाहर मान चुके थे।
अपने पहले ही मुकाबले में सिराज ने धमाकेदार प्रदर्शन कर यह साबित कर दिया कि मौके भले देर से मिले, लेकिन जब मिले तो उन्हें भुनाना उन्हें अच्छी तरह आता है।
बाद में मोहम्मद सिराज ने स्वीकार किया कि यह सब उनके लिए किसी सपने जैसा था। टी-20 फॉर्मेट में लंबे समय से मौके न मिलने के कारण उन्हें लगने लगा था कि शायद यह अध्याय अब बंद हो चुका है। लेकिन फिर अचानक फोन आया-और सब कुछ बदल गया। उस वक्त वह घर पर परिवार के साथ थे। सिराज ने बस इतना ही कहा, “ऊपरवाले ने चाहा तो रास्ता अपने आप बन गया।”
अमेरिका के खिलाफ वर्ल्ड कप के पहले ही मुकाबले में उन्हें सीधे प्लेइंग इलेवन में उतारा गया। और उन्होंने वही किया, जिसकी टीम इंडिया को सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी—नई गेंद से शुरुआती ब्रेकथ्रू और आखिर तक मैच पर नियंत्रण। 29 रन देकर तीन विकेट का आंकड़ा उनकी भूमिका को पूरी तरह बयान नहीं करता। प्लेयर ऑफ द मैच का पुरस्कार भले ही सूर्यकुमार यादव को मिला, लेकिन मैच की दिशा शुरुआती ओवरों में सिराज ने ही तय कर दी थी।
उनकी योजना बिल्कुल साफ थी-नई गेंद से स्टंप्स पर हमला, विकेट-टू-विकेट गेंदबाज़ी। यही सिराज का तरीका है, चाहे फॉर्मेट कोई भी हो। गेंद को पूरे ज़ोर से सही जगह पिच करना और प्रोसेस पर भरोसा रखना। मैच से एक रात पहले भी उनके ज़हन में यही था-अपने हथियारों पर भरोसा और सटीक एग्ज़ीक्यूशन।
आज भी उनके फोन के वॉलपेपर पर सिर्फ़ एक शब्द लिखा है—“BELIEF”। यह शब्द उनके सफ़र की याद दिलाता है और उन्हें ज़मीन से जोड़े रखता है। सिराज के लिए तैयारी सिर्फ़ नेट्स या ड्रिल्स तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक संतुलन और हर हाल में तैयार रहने की आदत है। भारतीय क्रिकेट में बिताए वर्षों ने उन्हें सिखाया है कि मौके कब आते हैं और उनके लिए कैसे तैयार रहना होता है।
वर्ल्ड कप का दबाव अलग होता है, भावनाएँ भी उफान पर होती हैं। लेकिन सिराज ने उस दबाव को अनुशासन में बदला। निजी योजनाओं या छूटे हुए पलों पर नहीं, बल्कि सही समय पर सही गेंद डालने पर उनका पूरा फोकस रहा।
जिस रात उन्हें बर्नबेउ की रोशनी में फुटबॉल देखना था, उसी रात वह फ्लडलाइट्स के नीचे गेंद थामे खड़े थे। टिकट की जगह हाथ में मैच बॉल थी। आराम की जगह अचानक मिला बुलावा। सिराज ने इसे सहजता से स्वीकार किया—जो लिखा है, वही होता है। और उस रात उनकी कहानी सीम मूवमेंट, स्विंग और तीन अहम विकेटों के साथ लिखी गई।