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रांची में ‘रेडर्स पर रेड’: ED दफ्तर में पुलिस का छापा, हाईकोर्ट की सख्ती से बदला पूरा खेल

झारखंड की राजधानी रांची में प्रवर्तन निदेशालय (ED) के जोनल ऑफिस पर रांची पुलिस की छापेमारी अब बड़ा विवाद बन चुकी है। यह मामला सिर्फ एक FIR या जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राज्य और केंद्र के बीच टकराव का नया उदाहरण बन गया है। 16 जनवरी 2026 को झारखंड हाईकोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम पर सख्त टिप्पणी करते हुए पुलिस की कार्रवाई को “प्रथम दृष्टया पूर्व-नियोजित” बताया और ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR और जांच पर तुरंत रोक लगा दी।

पूरा मामला क्या है?

दरअसल, इस विवाद की शुरुआत 12 जनवरी 2026 को हुई, जब पेयजल एवं स्वच्छता विभाग (PHED) के पूर्व कर्मचारी संतोष कुमार से ED ऑफिस में पूछताछ चल रही थी। संतोष ने आरोप लगाया कि पूछताछ के दौरान ED के दो अधिकारियों, प्रतीक और शुभम, ने उनके साथ मारपीट की, सिर फोड़ दिया और जबरन अपराध कबूल कराने का दबाव बनाया। इसके बाद संतोष कुमार ने रांची के एयरपोर्ट थाना में FIR दर्ज कराई (कांड संख्या 05/2026), जिसमें मारपीट समेत अन्य धाराओं में केस दर्ज हुआ।

इसी FIR की जांच के सिलसिले में 15 जनवरी की सुबह रांची पुलिस की एक टीम, जिसमें DSP स्तर के अधिकारी भी शामिल थे, सीधे ED ऑफिस पहुंच गई। पुलिस टीम ने वहां CCTV फुटेज, सेवा रिकॉर्ड और दूसरे जरूरी दस्तावेज जुटाए। खास बात यह रही कि इस दौरान फॉरेंसिक टीम (SFSL) भी साथ थी। इस घटना ने “रेडर्स पर रेड” जैसी दुर्लभ स्थिति पैदा कर दी, क्योंकि राज्य पुलिस ने एक केंद्रीय एजेंसी के दफ्तर में छापा मारा।

ED का पलटवार और हाईकोर्ट की सख्ती

पुलिस की इस कार्रवाई से नाराज ED ने उसी दिन यानी 15 जनवरी को झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया। ED ने अपनी याचिका में कहा कि राज्य पुलिस की यह कार्रवाई केंद्रीय एजेंसी के काम में सीधा हस्तक्षेप है। ED ने FIR रद्द करने और मामले की CBI जांच कराने की मांग की।

16 जनवरी को न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि पुलिस की छापेमारी प्रथम दृष्टया पूर्व-नियोजित लगती है। इसके साथ ही कोर्ट ने कई अहम आदेश दिए—पुलिस जांच पर तत्काल रोक लगा दी गई, ED ऑफिस और अधिकारियों की सुरक्षा के लिए CRPF या BSF जैसे केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती का आदेश दिया गया, केंद्रीय गृह सचिव को पक्षकार बनाने को कहा गया और राज्य सरकार से सात दिनों के भीतर जवाब मांगा गया। इसके अलावा रांची के SSP को ED परिसर की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई, साथ ही साफ कहा गया कि किसी भी चूक के लिए SSP जिम्मेदार होंगे। इस मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी 2026 को होगी।
सियासी पारा भी चढ़ा

मामले ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। बीजेपी ने इसे “बदले की कार्रवाई” करार दिया। उनका कहना है कि ED ने पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को मनी लॉन्ड्रिंग केस में जेल भेजा था, उसी का बदला अब राज्य सरकार ले रही है। बीजेपी नेताओं के बयान में “झारखंड को बंगाल नहीं बनने देंगे” जैसे तीखे शब्द भी सुनने को मिले।

वहीं, झामुमो ने पुलिस की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि पुलिस ने सिर्फ अपना कर्तव्य निभाया है और कानून से ऊपर कोई नहीं है।

कुल मिलाकर, यह मामला केंद्र और राज्य के बीच टकराव का एक और अध्याय बन गया है, खासकर पश्चिम बंगाल में हुए I-PAC रेड विवाद के बाद। फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश से ED को बड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन कानूनी लड़ाई और राजनीतिक बयानबाजी अभी थमने के आसार नहीं दिख रहे। आगे क्या होता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।

news desk

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