डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को एक बार फिर, यानी साल 2017 में सजा होने के बाद से अब तक 16वीं बार पैरोल मिल गई है। इस फैसले के सामने आते ही देश के राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी गलियारों में एक बार फिर यह बहस चरम पर पहुंच गई है कि क्या भारतीय जेलों के नियम रसूखदार और आम कैदियों के लिए अलग-अलग हैं?
सजा काटने के दौरान कभी पैरोल (Parole) तो कभी फरलो (Furlough) के सहारे बार-बार जेल से बाहर आने के इस सिलसिले ने भारतीय कारागार व्यवस्था की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आइए समझते हैं इस पूरे मामले का नया एंगल और पैरोल से जुड़े वो कानूनी पेंच जिन्हें जानना जरूरी है।
आम जनता के बीच अक्सर यह भ्रम रहता है कि जेल से बाहर आने की यह सहूलियत हर कैदी का कानूनी अधिकार है। लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) का रुख इस पर बेहद साफ है:
बलात्कार और हत्या जैसे संगीन मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे राम रहीम को महज 9 सालों के भीतर 16 बार जेल से बाहर आने की अनुमति मिलना कानूनी विशेषज्ञों को भी चौंका रहा है।
भारतीय जेल व्यवस्था में इन दोनों कानूनी प्रावधानों का उद्देश्य कैदियों का मानसिक संतुलन बनाए रखना और उन्हें समाज से जोड़े रखना है, लेकिन दोनों के नियम अलग हैं:
| मानक | पैरोल (Parole) | फरलो (Furlough) |
| कारण | किसी विशेष और अनिवार्य कारण (मौत, बीमारी, शादी) पर ही संभव। | बिना किसी विशेष कारण के भी नियमित अंतराल पर दी जा सकती है। |
| प्रकृति | यह एक विशिष्ट प्रशासनिक और कानूनी मंजूरी है। | इसे जेल में अच्छे व्यवहार के बदले मिलने वाली ‘छुट्टी’ माना जाता है। |
| सजा पर असर | इसके दौरान सजा की अवधि रुकी (Suspend) मानी जाती है। | यह कैदी के सामाजिक पुनर्वास और मानसिक स्वास्थ्य के लिए दी जाती है। |
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