पंजाब कांग्रेस में चल रही अंदरूनी खींचतान अब ‘आर-पार’ की लड़ाई में बदल चुकी है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के भीतर वर्चस्व की जंग बेहद आक्रामक मोड़ ले चुकी है। शनिवार को चंडीगढ़ के सेक्टर-4 में कांग्रेस विधायक राणा गुरजीत सिंह के आवास पर हुई एक हाई-प्रोफाइल बैठक ने राज्य के सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। पंजाब मामलों के नवनियुक्त प्रभारी भूपेश बघेल के सामने विरोधी धड़े ने जो चक्रव्यूह रचा है, उसने मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग की कुर्सी को हिलाकर रख दिया है।
राणा गुरजीत के निवास पर शनिवार को जो नजारा था, वह महज एक बैठक नहीं बल्कि राजा वड़िंग के खिलाफ एक खुला शक्ति प्रदर्शन था। प्रभारी भूपेश बघेल के पहुंचते ही पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा और सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने एक साथ मंच संभाला। इस बैठक में चन्नी समर्थक खेमे के करीब 70 से 80 पूर्व मंत्री, वर्तमान विधायक और दिग्गज नेता एकजुट हुए।
खबरों के मुताबिक, इस महाजुटान का असली एजेंडा बेहद साफ था, संगठन पर कब्जा और भविष्य की कमान। सूत्रों का दावा है कि चन्नी समर्थकों ने प्रभारी बघेल के सामने दो टूक शब्दों में मांग रख दी है कि आगामी विधानसभा चुनाव में चरणजीत सिंह चन्नी को ही मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया जाए, ताकि राज्य के बड़े दलित वोट बैंक को साधा जा सके।
इस पूरी सियासी स्क्रिप्ट का सबसे बड़ा ट्विस्ट यह रहा कि प्रदेश कांग्रेस के मौजूदा कैप्टन अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को इस बैठक से पूरी तरह आउट रखा गया। उन्हें इस बैठक का आमंत्रण तक नहीं भेजा गया। हालांकि, वड़िंग ने डैमेज कंट्रोल करते हुए बयान दिया कि चूंकि बैठक में उनके खिलाफ और सांगठनिक बदलावों पर चर्चा होनी थी, इसलिए उन्होंने खुद ही दूरी बनाना बेहतर समझा ताकि नेता खुलकर अपनी भड़ास निकाल सकें।
लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि बाजवा, रंधावा और चन्नी जैसे तीन धुर विरोधियों का एक मंच पर आ जाना और वड़िंग को किनारे लगा देना, यह साफ संकेत है कि हाईकमान के सामने वड़िंग को अलग-थलग करने की बिसात बिछाई जा चुकी है।
प्रभारी भूपेश बघेल के लिए पंजाब की यह गुटबाजी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। पंजाब कांग्रेस का इतिहास गवाह है कि ऐन चुनाव से पहले की गई आंतरिक कलह ने पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया था। बघेल ने नेताओं को सख्त लहजे में हिदायत दी है कि 2021 वाली गलतियां दोबारा नहीं होने दी जाएंगी। भले ही दिल्ली हाईकमान तुरंत वड़िंग को हटाने के मूड में न हो, लेकिन चन्नी गुट की नाराजगी और दलित प्रतिनिधित्व की मांग को नजरअंदाज करना भी बघेल के लिए मुमकिन नहीं होगा।
इस अंदरूनी घमासान और बगावती सुरों के बीच, कांग्रेस आलाकमान ने डैमेज कंट्रोल और कार्यकर्ताओं का ध्यान भटकाने के लिए बड़ा दांव खेला है। पंजाब में मचे इस बवाल के बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी के पंजाब दौरे का शेड्यूल फाइनल कर दिया गया है।
राहुल गांधी केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा के मुद्दे पर की जा रही नीतियों को घेरने के लिए पंजाब में चार बड़ी रैलियां करेंगे। हाईकमान को उम्मीद है कि राहुल के दौरों से गुटबाजी पर कुछ समय के लिए ब्रेक लगेगा, लेकिन चंडीगढ़ की इस बैठक ने जो चिंगारी सुलगाई है, वह इतनी जल्दी बुझती नजर नहीं आ रही।
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