विचार

पुण्यतिथि विशेष: सिर्फ कथा सम्राट नहीं, राष्ट्रीय चिंतक और विचारक भी थे प्रेमचंद

प्रेमचंद को प्रायः उपन्यास सम्राट या कथा सम्राट की पदवी दी जाती है. मेरे ख्याल से प्रेमचंद को सिर्फ उपन्यास या कथा सम्राट कहना, उनके लेखकीय व्यक्तित्व को किंचित सीमित करना होगा. वास्तविकता यह है कि प्रेमचंद केवल कथाकार नहीं थे अपितु वे एक बहुत बड़े राष्ट्रीय चिंतक, संपादक और विचारक थे. प्रेमचंद के कथाकार रूप के सामने प्रायः उनके चिंतक और विचारक रूप को सामने नहीं रखा जाता है जबकि जरूरत इस बात की है कि एक राष्ट्रीय चिंतक के रूप में प्रेमचंद के योगदान को समय-समय पर रेखांकित किया जाए.

प्रेमचंद ने ‘हंस’पत्रिका के जो संपादकीय लिखे हैं, उन संपादकीय लेखों में उनके समय का युग बोध प्रतिफलित होता है. उससे पता चलता है कि प्रेमचंद देश में घटित होने वाली सभी राजनीति घटनाओं और समाज में घटने वाली तमाम तरह की सामाजिक प्रक्रियाओं पर बड़ी पारखी और तीखी नजर रखते थे. वह अपने देश की राजनीतिक,सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक परिस्थितियों को बहुत ठीक से समझते थे. यही कारण है कि अपने वैचारिक लेखन में उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ हमारे समाज में नवजागरण के जो असली मुद्दे हैं, उनको भी केंद्र में रखा.

उनके लेखन के केंद्र में वास्तव में एक आधुनिक भारत के निर्माण की चिंता थी. आधुनिक भारत के निर्माण का प्रश्न भारतीय नवजागरण और हिंदी क्षेत्र में होने वाले नवजागरण दोनों के साथ संबंधित है. प्रेमचंद ने न केवल देश की गरीब और उपेक्षित जनता, किसान, मजदूर, अल्पसंख्यक, दलित, स्त्री का मामला उठाया बल्कि लोकतंत्र के और धर्मनिरपेक्षता के सवाल को भी बहुत गहराई से उठाया. इस प्रकार हम देखें तो प्रेमचंद के जो वैचारिक चिंतन थे, वही उनके कथा – कहानियों और उपन्यासों में प्रतिफलित हुए हैं, चित्रित हुए हैं. प्रेमचंद का संपूर्ण लेखन किस प्रकार एक आधुनिक और लोकतांत्रिक राष्ट्रीय चरित्र का बनकर के उभरता है,इसे देखा और समझा जा सकता है.

हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रायः भारतेंदु को आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक माना जाता है पर सच्चे अर्थों में देखें तो भारतीय विशेष करके हिंदी साहित्य की आधुनिकता के सच्चे प्रतिनिधि प्रेमचंद ही थे. क्योंकि प्रेमचंद लोकतांत्रिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता के साथ- साथ भारत की साझी विरासत की वकालत करते थे. वह हिंदी-उर्दू के हिमायती ही नहीं बल्कि दोनों को जोड़ने वाले मजबूत और विश्वसनीय पुल थे. यहां मैं उनकी एक कहानी ‘पंच परमेश्वर’ का जिक्र करना चाहूंगा. यह कहानी भारत की साझी विरासत और धर्मनिरपेक्ष चरित्र के ख्याल से बहुत ही महत्वपूर्ण है. इस कहानी में भारतीय समाज में हिंदू और मुसलमान किस तरह से एक साथ भारतीय बनाकर जी रहे हैं, इसका बड़ा ही मार्मिक और संवेदनशील चित्रण प्रेमचंद ने किया है और यह एक अभूतपूर्व रचना है. यहां जुम्मन शेख की पंचायत अलगू चौधरी करते हैं और अलगू चौधरी का पंचायत में निर्णय जुम्मन शेख करते हैं. यह भारतीय समाज की सांस्कृतिक मजबूती का प्रतीक है.

इसी प्रकार स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर बहुत सारी कहानियां और उपन्यास प्रेमचंद ने लिखे हैं, जिसमें सभी वर्गों के योगदान और सहभागिता को प्रेमचंद ने बड़ी शिद्दत के साथ चित्रित है. प्रेमचंद पूरे भारत को समझते थे. इसलिए उन्होंने जब बाबा साहब अंबेडकर का आंदोलन खड़ा हुआ तो अछूतों के मंदिर प्रवेश और सार्वजनिक स्थानों से उनके जल ग्रहण के मामले को जोरदार ढंग से उठाया. संभवत: 1934 में अपने ‘हंस’ के मुखपृष्ठ पर बाबा साहब की पूरी तस्वीर प्रकाशित कर उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट किया.

प्रेमचंद केवल हिंदी क्षेत्र तक सीमित नहीं थे बल्कि वह पूरे भारतीय स्तर पर चीजों को देखते थे. यही कारण है कि उनकी अखिल भारतीय दृष्टि ने उनको पूरे देश में हिंदी के एक प्रगतिशील लेखक के रूप में स्थापित किया. वह हिंदी का एक संघर्षशील चेहरा बन कर उभरे. सिर्फ भारत में ही नहीं, विदेशों में भी हिंदी की पहचान प्रेमचंद से है और यह एक अच्छी बात है,क्योंकि प्रेमचंद का लेखन मूलत: मानवतावादी था, आधुनिक था,लोकतंत्र और अहिंसा के पक्ष में था.

प्रेमचंद ने एक अद्भुत कार्य किया. वह कार्य यह था कि उन्होंने हिंदी कथा साहित्य में उस वर्ग के लोगों को नायक और नायिका के पद पर स्थापित किया, जिनका समाज, जिनका जीवन अभी तक हिंदी साहित्य के क्षेत्र में उपेक्षित रहा था. इस प्रकार से देश की गरीब और उपेक्षित जनता के लेखक के रूप में वे सामने आए. यह बिल्कुल अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं है कि अमृत राय ने उन्हें ‘कलम का सिपाही’ और मदन गोपाल ने उन्हें ‘कलम का मजदूर’ कहा है. असल में उन्होंने कलम देश के हित में ,गरीब जनता के हित में और सताए हुए लोगों के हित में उठाई थी. वह पीड़ितों के लेखक थे. सामंती मूल्यों के खिलाफ, कट्टर धार्मिक मूल्यों के खिलाफ वे आजीवन संघर्ष करते रहे और उन्होंने जिस प्रकार के भारत की कल्पना की थी, वह भारत बहुत कुछ बाबा साहब अंबेडकर के सपनों का भारत था, जिसमें समानता ,स्वतंत्रता, मुक्ति और भाईचारा का नारा सर्वोपरि था. प्रेमचंद मार्क्स के बताए हुए शोषण मुक्त देश और समाज की भी परिकल्पना करते थे. उनके सपनों का भारत एक ऐसा भारत था, जिसमें लोकतांत्रिक मूल्य सर्वोपरि थे.

प्रेमचंद का लेखन आज इसीलिए प्रासंगिक है, क्योंकि प्रेमचंद ने अपने वर्तमान के साथ-साथ देश और समाज के भविष्य का भी एक ठोस खाका खींचा था, जो आज भी हमें प्रेरित करता है. उनके निर्वाण दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि ज्ञापित करते हुए मैं उनके इस कथन को दोहराना चाहता हूं कि साहित्य राजनीति के पीछे नहीं बल्कि उसके आगे मशाल लेकर चलने वाली चीज है. हमें साहित्य के द्वारा मानवता की लड़ाई लड़नी होगी. प्रेमचंद के प्रति यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

प्रो. सूरज बहादुर थापा
हिंदी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय
ये लेखक के निजी विचार हैं

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